chevron_left  माचेल्लकैर्ललित्थैश्चarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
माचेल्लकैर्ललित्थैश्च सहितो मद्रकैरपि |
२० क
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
माठरस्य वनं पुण्यं वहुमूलफलं शिवम् |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
माण्डव्यशापाद्धि स वै धर्मो विदुरतां गतः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १००
वैशम्पाय़न उवाच
माण्डव्यस्यार्थतत्त्वज्ञः कामक्रोधविवर्जितः ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
माण्डव्यस्याश्रमे राजन्दिलीपस्याश्रमे तथा |
२७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
माण्डव्येनर्षिणा धर्मो ह्यभिभूतः सनातनः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
मातङ्ग इव मत्तेन मातङ्गेन निपातितः ||
४१ ग
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
मातङ्ग इव मातङ्गं प्रभिन्नकरटामुखः ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
मातङ्ग इव मातङ्गं यूथर्षभ इवर्षभम् ||
२१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
मातङ्गभुजवर्ष्माणौ ज्याक्षेपकठिनत्वचौ |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय २१
गान्धार्यु उवाच
मातङ्गमिव मत्तेन मातङ्गेन निपातितम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
मातङ्गमुन्मत्तमिवोन्नदन्तं; त्यजेत तं श्वानमिवातिरौद्रम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
मातङ्गा वरमातङ्गैः पदाताश्च पदातिभिः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
मातङ्गाङ्गशिलारौद्रा मांसशोणितकर्दमा ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
मातङ्गाश्चाप्यदृश्यन्त शरतोमरपीडिताः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
मातङ्गीमथ शार्दूलीं श्वेतां सुरभिमेव च |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
मातङ्गैः शुशुभे भूमिर्विकीर्णैरिव पर्वतैः ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
मातङ्गो न्यपतद्भूमौ नदीरोध इवोष्णगे ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
मातङ्गो मत्त इव च परीय़ात्सुमहामनाः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
मातङ्ग्यास्त्वथ मातङ्गा अपत्यानि नराधिप |
६४ क
आदि पर्व
अध्याय १३९
भीम उवाच
मातरं च नरो गच्छेत्कामार्त इव मद्विधः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
मातरं च पृथां धीमान्भ्रातॄंश्च पुरुषर्षभः ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
मातरं चाविदूरस्थां शिष्यवत्प्रणतां स्थिताम् |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय ६५
धृतराष्ट्र उवाच
मातरं चैव गान्धारीं मां च त्वद्गुणकाङ्क्षिणम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
मातरं चैव शोचामि कृपणां पुत्रगृद्धिनीम् |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
मातरं तां तथा दृष्ट्वा नीय़मानां वलादिव ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
मातरं तामथालोक्य रणभूमावथाव्रवीत् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४२
भीष्म उवाच
मातरं पितरं केचिच्छुश्रूषन्तो दिवं गताः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
मातरं पितरं चैव वान्धवान्सुहृदस्तथा |
७७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
मातरं पितरं चैव शुश्रूषन्ति जितेन्द्रिय़ाः |
९१ क
वन पर्व
अध्याय ६६
वृहदश्व उवाच
मातरं पितरं चैव सर्वं चैव सखीजनम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
मातरं पितरं वृद्धमाचार्यमतिथिं गुरुम् |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
मातरं पितरं वृद्धमाचार्यमतिथिं गुरुम् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
मातरं पूर्वजः पुत्रो व्यासो वचनमव्रवीत् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय १३९
भीम उवाच
मातरं भ्रातरं ज्येष्ठं कनिष्ठानपरानिमान् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
मातरं वानहंवादी गुरुमाचार्यमेव च ||
३८ ग
वन पर्व
अध्याय १९६
मार्कण्डेय़ उवाच
मातरं सदृशीं तात पितॄनन्ये च मन्यते |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
मातरं सरितां श्रेष्ठामपश्यं रथमास्थिताम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३४
वासुदेव उवाच
मातरं सर्वभूतानां पृच्छे त्वा संशय़ं शुभे |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
मातरः सर्वभूतानां गावः सर्वसुखप्रदाः ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय २१९
स्कन्द उवाच
मातरस्तु भवत्यो मे भवतीनामहं सुतः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १२८
लोमश उवाच
मातरस्तु वलात्पुत्रमपाकर्षुः कृपान्विताः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
मातरिश्वा ददौ पुत्रं भीमं नाम महावलम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
मातरिश्वान्तरे तस्मिन्मेघरुद्ध इवानदत् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय २१४
शिवो उवाच
मातरो मां प्रतीक्षन्ते गमिष्यामि हुताशन ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
मातरो विविधा दृष्टाः पितरश्च पृथग्विधाः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय २१९
स्कन्द उवाच
मातरो हि भवत्यो मे सुतो वोऽहमनिन्दिताः |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
मातरौ ते तथैवेमे शीर्णपर्णकृताशने |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०१
कण्व उवाच
मातलिं प्रीतिमनसं दृष्ट्वा सुमुखदर्शनात् |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
मातलिर्नागलोकाय़ चकार गमने मतिम् ||
१९ ख