आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
एवं ह्याहुः ||
९३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
एवं ह्येतेन योगेन युञ्जानोऽप्येकमन्ततः |
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
एवंरूपं कर्मफलं नरेन्द्र; मात्रावता हृदय़स्य प्रिय़ेण |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके; द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
गङ्गो उवाच
एवंरूपः स भगवान्पुत्रस्ते हव्यवाहन |
७२ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
एवंरूपगुणोपेता कुतस्त्वमसि शोभने ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
एवंरूपे वासुदेवेऽप्रमेय़े; महावले गुणसम्पत्सदैव ||
८१ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
एवंरूपेति सा शक्या न निर्देष्टुं जनाधिप |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
एवंवादी वेदितव्यः पाण्डवेय़ोऽय़मित्युत ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
एवंविधं कार्मुकभीमनाद; मदीनवत्सत्पुरुषोत्तमाभ्याम् |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
एवंविधं त्वां तच्च नाभूत्तवाद्य; देवा हि नूनमनृतं वदन्ति ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
एवंविधं मे प्रतिभाति काम्यकं; शौण्डैर्यथा पीतरसश्च कुम्भः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
एवंविधं वहु तदा विलपन्तं सुदुःखितम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
एवंविधं वहु तदा विलपन्तीं महानदीम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
एवंविधं वहु तदा विललाप वृकोदरः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२५६
भीमसेन उवाच
एवंविधं हि कः कुर्यात्त्वदन्यः पुरुषाधमः ||
२१ ग
आदि पर्व
अध्याय
४२
जरत्कारुरु उवाच
एवंविधमहं कुर्यां निवेशं प्राप्नुय़ां यदि |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
एवंविधस्ते तनय़ो द्वैपाय़न भविष्यति ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
एवंविधस्येह सतस्तवासौ; कथं वृत्रस्त्रिदिवं प्राग्जहार ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
एवंविधा नरा देवि सर्वे निरय़गामिनः ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
एवंविधा हि सा रात्रिः सोमकानां जनक्षय़े |
१४२ क
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
एवंविधाः सुवहवस्तस्य यज्ञे महात्मनः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
एवंविधानां दुःखानामभिज्ञोऽसि जनार्दन |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
एवंविधानि हीष्टानि दुस्त्यजानि विशेषतः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
एवंविधाश्चाप्यपरे देवकल्पा महारथाः |
५५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
एवंविधास्तु ये केचिल्लोकेऽस्मिन्पापकर्मिणः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
एवंविधे तथा काले मदृशं प्रेक्ष्य संमतम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
सौदास उवाच
एवंविधे ममैते वै कुण्डले परमार्चिते |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
एवंविधेन तपसा तस्य भक्त्या च भारत |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
एवंविधेस्त्वगस्त्यस्य वर्तमाने महाध्वरे |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
एवंविधैश्च वहुभिरपरैः प्राकृतैरपि ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
एवंविधो धर्मनित्यो भगवान्मुनिभिः सह |
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
एवंवीर्यः सर्वधर्मोपपन्नः; क्षात्रः श्रेष्ठः सर्वधर्मेषु धर्मः |
१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
द्रौणिरु उवाच
एवंवीर्यो मणिरय़ं न मे त्याज्यः कथञ्चन ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
एवंवृत्तं सदा क्षत्रं यद्धन्तीह गुरूनपि ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
एवंवृत्तः प्रजा रक्षन्स्वर्गं जेतासि दुर्जय़म् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
एवंवृत्तः प्रिय़ैर्दारैः संवसन्धर्ममाप्नुय़ात् ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३८
व्रह्मो उवाच
एवंवृत्तास्तु ये केचिल्लोकेऽस्मिन्सत्त्वसंश्रय़ाः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
८८
यय़ातिरु उवाच
एवंवृत्तो ह्रीनिषेधश्च यस्मा; त्तस्माच्छिविरत्यगाद्वै रथेन ||
१९ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
एवंव्यूहं महाराज तव सैन्यं महारथैः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
एवंव्रतोऽस्मीति च मामवोच; त्फलानि चान्यानि नवान्यदान्मे ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
एवंशीलसमाचारः स्वर्गे समुपजाय़ते |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
एवंशीलसमाचारो निरय़ं प्रतिपद्यते ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
एवंस्वभावमेवेदमिति विद्वान्न मुह्यति |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
एवंस्वभावमेवैतत्स्ववुद्ध्या विहरेन्नरः |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
एवंय़ुक्तः सर्वमन्त्रैरहीनो; अनानृशंस्यं कर्म कुर्यादमूढः ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
एवंय़ुक्तो महाराजः पाण्डवः पार्थिवर्षभः |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
एवङ्गते तु किं शक्यं मय़ा कर्तुमरिन्दम |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
नकुल उवाच
एवङ्गते त्वय़ि ज्येष्ठे मम भ्रातरि भारत |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
एवङ्गते न हीदानीं वैद्यैः कार्यमिहास्ति मे |
५३ क