शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च |
८४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
मातापित्रोः पूजने यो धर्मस्तमपि मे शृणु |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
मातापित्रोः प्रजाय़न्ते पुत्राः साधारणाः कवे |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
मातापित्रोरर्चिता सत्ययुक्तः; शुश्रूषिता व्राह्मणानामनिन्द्यः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२७
यम उवाच
मातापित्रोरहरहः पूजनं कार्यमञ्जसा ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
मातापित्रोर्गुरुषु च सम्यग्वर्तन्ति ये सदा |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
मातापित्रोर्गुरूणां च पूजा वहुमता मम |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
मातापित्रोर्यश्च वश्यः श्रोत्रिय़ो दशपूरुषः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
८०
यय़ातिरु उवाच
मातापित्रोर्वचनकृद्धितः पथ्यश्च यः सुतः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
मातापित्रोर्हि कर्तव्या शुश्रूषा सर्वदस्युभिः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
मातापित्रोश्च ये वृत्तिं वर्तन्ते धर्मकोविदाः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
मातापित्रोश्च शुश्रूषा देवतातिथिपूजनम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२०६
मार्कण्डेय़ उवाच
मातापित्रोश्च शुश्रूषा व्याधे धर्मश्च कीर्तितः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
ऋषिरु उवाच
मातापित्रोश्च शुश्रूषां करिष्यसि न संशय़ः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
मातामहं नृपतय़स्तारय़न्तो दिवश्च्युतम् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२०
नारद उवाच
मातामहं महाप्राज्ञं दिवमारोपय़न्ति ते ||
१७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
प्रह्राद उवाच
मातास्य श्रेय़सी मातुस्तस्मात्त्वं तेन वै जितः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
मातिशङ्कीर्वचो मह्यमजेय़ौ कृष्णपाण्डवौ ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
मातीक्ष्णो मामृदुर्भूस्त्वं तीक्ष्णो भव मृदुर्भव ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
मातुः कुलं पितृकुलं यत्र चैव प्रदीय़ते |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
मातुः पितुः कर्मणाभिप्रसूतः; संवर्धते विधिवद्भोजनेन ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
मातुः पितुर्गुरूणां च कार्यमेवानुशासनम् |
१३७ क
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
मातुः सकाशं दुःखार्ता नलशङ्कासमुत्सुका ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
मातुः सकाशात्तं शापं श्रुत्वा पन्नगसत्तमः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६९
गन्धर्व उवाच
मातुः समक्षं कौन्तेय़ अदृश्यन्त्याः परन्तप ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
मातुः समागमो यश्च तत्सर्वं प्रत्यवेदय़त् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
मातुरन्तिकमागच्छत्परं तीरं महोदधेः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
३४
सूत उवाच
मातुरुत्सङ्गमारूढो भय़ात्पन्नगसत्तमाः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
मातुर्दास्यविमोक्षार्थमाहरिष्ये तमद्य वै ||
७ ग
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
मातुर्दोषादृषेः कोपादन्ध एव व्यजाय़त ||
७८ ग
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
मातुर्निय़ोगाद्धर्मात्मा गाङ्गेय़स्य च धीमतः ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
मातुर्भरणमात्रेण प्रीतिः स्नेहः पितुः प्रजाः ||
३३ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
मातुर्हि वचनं श्रुत्वा तदा सलिलकर्मणि |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
मातुलं न च स्वस्रीय़ो न सखाय़ं सखा तथा |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
मातुलं प्रीतिपूर्वेण शल्यं चक्रे वशे वली ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
मातुलं वसुदेवं त्वं वलदेवं च माधव |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
मातुलः शकुनिः शल्यः कृपो द्रोणो विविंशतिः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
मातुलश्चिरदृष्टो मे त्वय़ा देवी च देवकी ||
४३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
मातुलस्य कुलं भद्रे तव पुत्रो गमिष्यति ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
अभिमन्युरु उवाच
मातुलस्य च या प्रीतिर्भविष्यति पितुश्च मे ||
२५ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
मातुलस्य च वृद्धस्य रामादीनां तथैव च ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
मातुला भागिनेय़ाश्च तथा सम्वन्धिवान्धवाः ||
१३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः स्यालाः सम्वन्धिनस्तथा ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
मातुलानां पितॄणां च तेजसोऽस्त्रवलस्य च ||
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
मातुलान्भागिनेय़ांश्च तथा सम्वन्धिवान्धवान् ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
मातुलान्भागिनेय़ांश्च परानपि च संय़ुगे ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
मातुलेनैवमुक्तस्तु द्रौणिः शस्त्रभृतां वरः |
६८ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
मातुलो भवतः शूरः पुरुजित्कुन्तिवर्धनः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
मातुलो भागिनेय़श्च देवलोकादिहागतौ |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
मातुलो भीमसेनस्य स च मेऽतिरथो मतः ||
२ ख