द्रोण पर्व
अध्याय
५
कर्ण उवाच
एवं दुर्योधनाचार्यमाशु सेनापतिं कुरु |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
एवं दुर्योधने राजन्गर्जमाने मुहुर्मुहुः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
एवं दुर्योधनेनोक्तं सर्वे सम्पूज्य तद्वचः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
भीष्म उवाच
एवं दुर्वुद्धिना प्राप्तमुष्ट्रेण निधनं तदा |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
६६
शकुन्तलो उवाच
एवं दुहितरं विद्धि मम सौम्य शकुन्तलाम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
एवं दृष्टो मय़ा कृष्ण देवदेवः समाधिना |
१९७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
एवं दृष्ट्वा कृतं कर्म भीमसेनेन संय़ुगे |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
४२
जरत्कारुरु उवाच
एवं दृष्ट्वा तु भवतः शकुन्तानिव लम्वतः |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
एवं दृष्ट्वा नाभिविन्दामि शर्म; परीक्षमाणोऽपि कुरुप्रवीर |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
एवं देवगणैः सर्वैः सोऽभिषिक्तः स्वलङ्कृतः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
एवं देवा यजन्तो हि सिद्धाश्च परमर्षय़ः |
८८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
एवं देवो महात्मा स पावकं पुरुषो गिरन् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं द्यूतजिताः पार्थाः कोपिताश्च दुरात्मभिः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
एवं द्वन्द्वशतान्यासंस्त्वदीय़ानां परैः सह |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
एवं द्वन्द्वशतान्यासन्रथवारणवाजिनाम् |
५९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
एवं द्वन्द्वसहस्राणि रथवारणवाजिनाम् |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
एवं द्वन्द्वान्यथैतानि वर्तन्ते मम नित्यशः |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
एवं द्वादश वर्षाणि तापय़ामास रोदसी |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
एवं द्वादशविस्तारं तेजसो रूपमुच्यते |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
एवं द्वादशविस्तारो ज्योतीरूपगुणः स्मृतः ||
३२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
एवं द्वादशविस्तारो वाय़व्यो गुण उच्यते ||
३४ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
एवं द्वादशविस्तारो वाय़व्यो गुण उच्यते |
५० क
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
एवं द्वापरमासाद्य प्रजाः क्षीय़न्त्यधर्मतः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
एवं द्वितीय़े सम्प्राप्ते पर्वकाले मनीषिणः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
एवं द्वैपाय़नो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात् |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
एवं धर्मं पालय़िष्यस्यथोक्तं; न चात्मानं मज्जय़िष्यस्यधर्मे |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
एवं धर्मं प्रय़त्नेन कौन्तेय़ परिपालय़न् |
३१ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं धर्मजितां कृष्णां मन्यसे न जितां कथम् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
एवं धर्मप्रधानास्ते सत्यव्रतपराय़णाः |
२७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं धर्मभृतां श्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं धर्ममनुक्रान्तं सदा दानपरैर्नरैः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
एवं धर्ममनुक्रान्ताः सत्यदानतपःपराः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
एवं धर्मस्त्वामुपैष्यत्यमेय़ो; न चाधर्मं लप्स्यसे तुल्यवृत्तिः ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
एवं धर्मस्य विज्ञेय़ं संसाधनमुपाय़तः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
एवं धर्मा राजधर्मैर्विय़ुक्ताः; सर्वावस्थं नाद्रिय़न्ते स्वधर्मम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
एवं धर्मान्राजधर्मेषु सर्वा; न्सर्वावस्थं सम्प्रलीनान्निवोध ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६६
भीष्म उवाच
एवं धर्माभ्युपाय़ेषु नान्यद्धर्मेषु कारणम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
एवं धर्मेण वर्तेत क्रिय़ाः शिष्टवदाचरेत् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
एवं धर्मेण वृत्तेन प्रजास्त्वं परिपालय़न् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
एवं धूपप्रदानं च दीपदानं च साधवः |
७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
व्यास उवाच
एवं धृतिमतः साधोः सर्वास्त्रविदुषः सतः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
एवं ध्याय़न्ति विद्वांसः परं तत्त्वं सनातनम् |
१८१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
अगस्त्य उवाच
एवं न दग्धः स मय़ा भवता च न संशय़ः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
एवं न व्यथते प्राज्ञः कृच्छ्रामप्यापदं गतः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११२
नारद उवाच
एवं न शक्यते लव्धुमलव्धव्यं द्विजर्षभ ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११७
नारद उवाच
एवं न शक्यमप्राप्यं प्राप्तुं गालव कर्हिचित् ||
८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
एवं न सम्प्रकुप्यन्ते जनाः सुखितदुःखिताः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
एवं न स्त्री न चैवाहं नाध्वगस्त्रिदशेश्वरः |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
एवं नराणां मनसि त्रिषु भावेष्ववस्थिता ||
२२ ख