उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
मन्त्रय़ामास च तदा कर्णेन सुचिरं सह ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
मन्त्रय़ामास सचिवैर्धर्मज्ञैश्च पुरोहितैः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
मन्त्रय़ामासुरन्याश्च रहस्यानि परस्परम् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
मन्त्रय़ामासुरव्यग्रा मन्त्रनिश्चय़कोविदाः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
मन्त्रय़ामासुरेकाग्राः शक्रार्थं राजसत्तम ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
मन्त्रय़ित्वा ततः सेनां तावाज्ञापय़तां तदा ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
मन्त्रय़ित्वा तु कौन्तेय़ उत्तरेण रहस्तदा |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
युधिष्ठिर उवाच
मन्त्रय़िष्ये तवार्थाय़ न तु योत्स्ये कथञ्चन |
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
मन्त्रय़ुक्तान्समददात्ते च प्रीतास्तदाभवन् ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
मन्त्रय़ेत्सह विद्वद्भिः शक्तैः कर्माणि कारय़ेत् |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
१५
सूत उवाच
मन्थध्वमुदधिं देवा वेत्स्यध्वममृतं ततः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६०
मार्कण्डेय़ उवाच
मन्थरा मानुषे लोके कुव्जा समभवत्तदा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२६०
मार्कण्डेय़ उवाच
मन्थरां वोधय़ामास यद्यत्कार्यं यथा यथा ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
मन्थानं मन्दरं कृत्वा तथा नेत्रं च वासुकिम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१००
नारद उवाच
मन्थानं मन्दरं कृत्वा देवैरसुरसंहितैः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
मन्थानो वहुलो वाहुः सकलः सर्वलोचनः ||
१२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
मन्दपालश्चरंस्तस्मिन्वने लपितय़ा सह ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
मन्दपालस्ततो देशादन्यं देशं जगाम ह ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२३
वैशम्पाय़न उवाच
मन्दपालेन यूय़ं हि मम पूर्वं निवेदिताः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
मन्दपालोऽपि कौरव्य चिन्तय़ानः सुतांस्तदा |
१ क
वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
मन्दप्रख्याय़मानेन रूपेणाप्रतिमेन ताम् |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
मन्दप्राणगतिर्धीमान्कृच्छ्रादिव समुद्धरन् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
मन्दभाग्यतय़ा वापि मम रक्षसि पाण्डवान् ||
३९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
मन्दभाग्यतय़ास्म्येतं क्षत्रधर्ममनु ष्ठितः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
मन्दभाग्या गमिष्यामि व्यक्तमद्य यमक्षय़म् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
पितर ऊचुः
मन्दभाग्योऽल्पभाग्यानां तप एव समास्थितः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
मन्दभाग्योऽल्पभाग्यानां वन्धुः स किल नः कुले |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
मन्दरं पर्वतं चाक्षं जङ्घास्तस्य महानदीः |
६९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
मन्दरं पर्वतवरं लताजालसमावृतम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
मन्दरं मनुजव्याघ्र नीलं चापि महागिरिम् |
१०३ क
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
मन्दरं शैलराजं तमाप्रष्टुमुपचक्रमे ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
मन्दरश्मिः सहस्रांशुरस्तं गिरिमुपागमत् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
मन्दरस्य प्रदेशांश्च किंनरोद्गीतनादितान् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
मन्दरोद्धरणे यत्नः क्रिय़तां च हिताय़ नः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
मन्दलोलुपता दुःखमिति वुद्धं चिरान्मय़ा |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
मन्दवेगतरा नागा वभूवुस्ते विचेतसः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
मन्दवेगानिषूंस्ताभ्यामजिघांसुरवासृजत् ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
मन्दा मृदुषु कौरव्यास्तीक्ष्णेष्वाशीविषोपमाः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
मन्दाः कर्तुमिहेच्छन्ति न चावाप्यं कथञ्चन ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
मन्दाकिनी वैश्रवणस्य राज्ञो; महाभोगा भोगिजनप्रवेश्या |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
मन्दाकिनीं च नलिनीं धनदस्य महात्मनः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
मन्दाकिनीं वैतरणीं कोकां चैव महानदीम् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
मन्दाकिनीं समासाद्य नदीं पापप्रमोचनीम् ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
मन्दानां मम पुत्राणां जय़ाशा यस्य विक्रमे |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
धृतराष्ट्र उवाच
मन्दानां मम पुत्राणां युद्धेनान्तं करिष्यति ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
मन्दानां मम पुत्राणां युद्धेनान्तं करिष्यति ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५२
धृतराष्ट्र उवाच
मन्दानां मम पुत्राणां युद्धेनान्तं करिष्यति ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
मन्दारपुष्पैः सङ्कीर्णा तथा मन्दाकिनी नदी |
३६ क
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
मन्दाराणामुदाराणां वनानि सुरभीणि च |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
मन्दीभूते च पवने तस्मिन्रजसि शाम्यति |
१६ क