chevron_left  मानाग्निहोत्रमुतarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं; मानेनाधीतमुत मानय़ज्ञः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय ८५
यय़ातिरु उवाच
मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं; मानेनाधीतमुत मानय़ज्ञः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
मानात्स तप्तवान्राजा वरार्थी सुमहत्तपः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ९२
लोमश उवाच
मानाभिभूतानचिराद्विनाशः प्रत्यपद्यत |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
मानार्हा मानिता नित्यं ज्ञानविद्भिर्महात्मभिः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
मानावमानय़ोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षय़ोः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १५९
वैश्रवण उवाच
मानितः कुरुतेऽस्त्राणि शक्रसद्मनि भारत ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
मानिता वान्धवाः सर्वे मान्यः सम्पूजितो जनः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
मानितास्ते तु विप्रेन्द्रास्त्वं तु गच्छ द्विजोत्तम ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
मानितौ च मय़ा वीरौ राधेय़ वचनात्तव ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
मानिनं समरे दृप्तं कृतवैरं महारथम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
मानिनां कुलजातानां नित्यं शास्त्रार्थचक्षुषाम् |
३६ क
सभा पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
मानिनां वलिनां राज्ञां मध्ये सन्दर्शिते पदे ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
मानी द्रौणिरसम्भ्रान्तो वाणपाणिरभाषत ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
मानुषं कुर्वतः कर्म यदि दैवान्न सिध्यति |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४८
नाग उवाच
मानुषं केवलं विप्रं देवं वाथ शुचिस्मिते ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
मानुषं गात्रसंस्पर्शं गत्वा भीम त्वय़ा सह ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
मानुषं लोकमातिष्ठ वासुदेव इति श्रुतः |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
मानुषं वचनं प्राह धृष्टो विलशय़ो महान् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
धृतराष्ट्र उवाच
मानुषं वारुणाग्नेय़ं व्राह्ममस्त्रं च वीर्यवान् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
मानुषं विग्रहं कृत्वा साक्षादमरवर्णिनी ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
मानुषं विग्रहं श्रीमत्कृत्वा सा वरवर्णिनी ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
मानुषं समनुप्राप्तो वपुः परमशोभनम् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
मानुषत्वमनुप्राप्य क्षीणाय़ुरुपपद्यते ||
१०५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
मानुषत्वाद्दिवं याति दिवो मानुष्यमेव च |
३ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
मानुषस्य तु पूर्वेण क्रोशमात्रे महीपते |
५५ क
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
मानुषस्य मनुष्येन्द्र गदाहस्तो जनाधिपः ||
५५ ग
वन पर्व
अध्याय २०६
व्याध उवाच
मानुषा मानसैर्दुःखैर्युज्यन्ते अल्पवुद्धय़ः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
मानुषा मानुषानेव दासभोगेन वुञ्जते ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
मानुषाणां कुतः स्नेहो येषां शोको भविष्यति |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
मानुषाणां मलं म्लेच्छा म्लेच्छानां मौष्टिका मलम् |
७० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
मानुषाणां सहस्रेषु हतेषु पतितेषु च |
१०८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
मानुषाणामधिपतिं देवभूतं सनातनम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय ११४
युधिष्ठिर उवाच
मानुषादस्मि विषय़ादपेतः पश्य लोमश ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
अर्जुन उवाच
मानुषानति गन्धर्वान्सर्वान्गन्धर्व लक्षय़े |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
व्रह्मो उवाच
मानुषानथ गन्धर्वान्नागानथ च पक्षिणः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७
युधिष्ठिर उवाच
मानुषान्कामभोगांस्त्वमैश्वर्यं च प्रशंससि |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
मानुषान्दुर्जय़ान्कृत्स्नान्पैशाचान्विषय़ांस्तथा ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
कीट उवाच
मानुषास्तिर्यगाश्चैव पृथग्भोगा विशेषतः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
मानुषीं मां विजानीत मनुजाधिपतेः सुताम् |
११८ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
मानुषीं मां विजानीत यूय़ं सर्वे तपोधनाः |
७१ क
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
मानुषीं मां विजानीहि भर्तारं समनुव्रताम् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
मानुषीं योनिमास्थाय़ चरिष्यति महीतले ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
मानुषीणां मृगीणां च न पिवेद्व्राह्मणः पय़ः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
मानुषीश्चैव दिव्याश्च कुर्वाणो विविधाः क्रिय़ाः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
मानुषे नृप लोकेऽस्मिन्सर्वशस्त्रभृतां वरः ||
७४ ख
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
मानुषेण कृतं कर्म विधत्स्व यदनन्तरम् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
मानुषेण नरव्याघ्रा वीर्यवन्तोऽस्त्रपारगाः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २
सञ्जय़ उवाच
मानुषेणैव युद्धेन तामवस्थां प्रवेशितः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
व्रह्मो उवाच
मानुषेषु च कुर्वाणाः प्रजाः कर्म सुतास्तव |
३६ क