कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
मामकस्यास्य सैन्यस्य हृतोत्सेधस्य सञ्जय़ |
१०६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
धृतराष्ट्र उवाच
मामका यदकुर्वन्त तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
धृतराष्ट्र उवाच
मामका वा जय़ं युद्धे प्राप्नुय़ुर्येन सञ्जय़ ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
धृतराष्ट्र उवाच
मामका वा भीष्मनेत्राः समीके; पाण्डवा वा भीमनेत्रास्तदानीम् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
मामकाः के महेष्वासा नाजहुः सञ्जय़ाच्युतम् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
मामकाः पाण्डवानां वा तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय़ ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
धृतराष्ट्र उवाच
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वन्नतः परम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
मामकानां च ये शूराः कांस्तत्र समवारय़न् ||
१९ ग
शल्य पर्व
अध्याय
७
धृतराष्ट्र उवाच
मामकानां परेषां च किं शिष्टमभवद्वलम् ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
मामकेन शरीरेण राज्यमेकः प्रशास्तु वः |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
मामकेषु तथा भीमो वलेषु विचरिष्यति ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५२
धृतराष्ट्र उवाच
मामकेषु रणं कर्ता वलेषु परमास्त्रवित् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
धृतराष्ट्र उवाच
मामकैः प्रतिपन्नं यत्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
मामग्ने कामसन्तप्तां त्वं कामय़ितुमर्हसि |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
मामजित्वा न वीभत्सो शक्यो जेतुं जय़द्रथः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
मामदस्व मृगश्रेष्ठ विशोकां कुरु दुःखिताम् ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
मामद्य सात्वतश्रेष्ठ पातय़स्व महाहवे ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
मामनादृत्य कौरव्य तव नित्यं हितैषिणम् ||
६९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
मामनादृत्य देवांश्च विनाशं यक्षरक्षसाम् |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
मामनिर्जित्य समरे शत्रुमध्ये महावल ||
८० ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
शुक्र उवाच
मामनुध्याय़ भावेन न च पापमवाप्स्यसि ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
मामनुस्मरती शेते वाह्लीकं कुरुवासिनम् ||
२० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
मामप्युद्धृतवान्कृच्छ्रात्पौलोमीं मघवानिव ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
मामप्राप्यैव कौन्तेय़ ततो यान्त्यधमां गतिम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैश्रवण उवाच
मामवज्ञाय़ दुष्टात्मा यस्मादेष सखा तव ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
मामवेक्षस्व गाङ्गेय़ कार्यं हि महदुद्यतम् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
मामसौ पुत्रहन्तेति श्वोऽभिय़ाता धनञ्जय़ः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूय़काः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
मामासाद्य पतिं भद्रे न त्वं राक्षसवेश्मनि |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
मामासादय़ दुर्वुद्धे तरसा त्वं नराशन ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
मामिय़ं ह्यनुरक्तेदं दुःखमाप्नोति मत्कृते |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
मामुक्त्वा पुरुषव्याघ्र प्रीतिय़ुक्तमिदं वचः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
मामुपस्थास्यति व्यक्तं दिवि शक्रमिवाप्सराः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
मामुपाय़ान्तमालोक्य गृहीतमिति विद्धि तम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
मामुपेत्य तु कौन्तेय़ पुनर्जन्म न विद्यते ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालय़मशाश्वतम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
मामूचुर्भृशसन्तप्ता भव राजेति सन्ततम् ||
२९ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
मामेकमभिसंय़ातौ सुजातं शल्य पश्य मे ||
६३ ख
वन पर्व
अध्याय
५३
नल उवाच
मामेव गतसङ्कल्पा वृणीते सुरसत्तमाः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
मामेव धास्यतीत्येवमिन्द्रो अभ्यवपद्यत |
७७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
मामेव परिगर्हन्ते नान्यं कञ्चन पार्थिवम् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
मामेव भृशसङ्क्रुद्धा हन्तुमभ्युद्यता युधि ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
मामेव यजतां शक्रः पावय़िष्यामि वज्रिणम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
मामेव ये प्रपद्यन्ते माय़ामेतां तरन्ति ते ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
मामेव विशिखैस्तूर्णमभिद्रवतु दंशितः ||
७७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
मामेव सततं विप्राश्चिन्तय़न्त उपासते ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
मामेव हि विशेषेण विभाष्य परिगर्हसे ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११५
दिवोदास उवाच
मामेवमुपय़ातोऽसि भावि चैतदसंशय़म् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
मामेवादत्त मां दत्त मां दत्त्वा मामवाप्स्यथ |
३२ क