शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
मय़ूरग्रीववर्णाभो मुक्ताहारनिभः क्वचित् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६४
भीष्म उवाच
मय़ूरजीर्णपर्णानां वस्त्रं तस्याश्च पर्णिनाम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ूरदात्यूहचकोरसङ्घा; स्तस्मिन्वने काननकोकिलाश्च ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
मय़ूररवघुष्टानि ददर्श विपुलेक्षणा ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ूरसदृशांश्चान्यान्सर्वाननिलरंहसः ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ूरसदृशानन्यानुभय़ानेव चापरान् ||
२६ ग
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
मय़ूरहंससंय़ुक्तं विमानं लभते नरः ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
मय़ूरहंससंय़ुक्तं विमानं लभते नरः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ूरहंसस्वननादितानि; पुष्पोपकीर्णानि महाचलस्य |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
मय़ूराः पुष्पशकुना हंसाः सारसचातकाः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
मय़ूरान्कुक्कुटांश्चापि पुत्रकाञ्जीवजीवकान् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ूरान्ददृशुश्चित्रान्नृत्यतो वनलासकान् ||
५४ ग
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
मय़ूरैः शतपत्रैश्च कोकिलैर्जीवजीवकैः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
मय़ूरैश्चक्रवाकैश्च कूजद्भिरुपशोभितम् ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
मय़ूरो वृषसेनस्य काञ्चनो मणिरत्नवान् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
मय़ेदं कृतमित्येव मन्यसे राजसत्तम ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४४
व्यास उवाच
मय़ेदं मनसा पूर्वं विदितं भरतर्षभाः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९८
नारद उवाच
मय़ेन मनसा सृष्टं पातालतलमाश्रितम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
मय़ेह ज्ञानसम्पन्नं यथाश्रुतिनिदर्शनात् ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
मय़ेय़ं रक्ष्यते मूढ गच्छ पाप यथागतम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
मय़ैकेन निरस्तानि ससैन्यानि रणाजिरे ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
मय़ैकेन रणे राजन्ससुहृद्गणवान्धवान् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
मय़ैकेन हि युध्यस्व क्रुद्धः प्रहर चाशुगैः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ैतच्चिन्तितं भूतमसिर्नामैष वीर्यवान् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
मय़ैतत्कथितं सम्यक्तव मूर्तिचतुष्टय़म् ||
४३ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ैतदस्त्रमुत्सृष्टं भीमसेनभय़ान्मुने ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
मय़ैतन्नाम प्रध्यातं मनसा शोचता किल ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
मय़ैते निहताः सर्वे भ्रातरस्ते महौजसः ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
४१
शिशुपाल उवाच
मय़ैव कथितं पूर्वं भूलिङ्गशकुनिर्यथा ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
मय़ैव सह राजेन्द्र जगाम वसुधातलम् ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
मय़ैवैकेन युध्यस्व त्र्यम्वकेणान्धको यथा ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
मय़ैवैतद्वितीर्णं वै वचनं मनसामराः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
मय़ैवैतानि कर्माणि पूर्वदेहेषु मूढय़ा |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
मय़ैवैते निहताः पूर्वमेव; निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ैष प्रार्थितः पूर्वं नीलमेघसमप्रभः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
मय़ैषा तपसा प्राप्ता क्रोशतस्ते जलाधिप |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
मय़ोक्तं भरतश्रेष्ठ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ||
१०९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
मय़ोक्ता गच्छत क्षिप्रं स्वं स्वमेव निवेशनम् ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८३
अत्रिरु उवाच
मय़ोक्तामन्यथा व्रूय़ुस्ततस्ते वै निरर्थकाम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ोक्ते यत्र निर्मुक्ता वनवासाय़ केशव ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
मय़ोच्यमानं पुरुषर्षभ त्व; मनन्यचित्तः सह सोदरीय़ैः ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ोच्यमानां शृणु वै पुण्यां राजेन्द्र कृत्स्नशः ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
मय़ोपमन्युः सर्वतः प्रतिषिद्धः |
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
मय़ोपय़ुक्तानि फलानि तानि; नेमानि तुल्यानि रसेन तेषाम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
मय़्यपेक्षा न कर्तव्या कथञ्चिदपि सात्वत |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
मय़्यभागिनि राज्याय़ कथं त्वं राज्यमिच्छसि ||
३० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
मय़्यर्पितमनोवुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशय़ः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
मय़्यर्पितमनोवुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रिय़ः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
मय़्यवर्षत दुर्धर्षः शरधाराः सहस्रशः ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
मय़्यार्जवे जिह्मगतिर्हतस्त्वं; मित्रद्रोही सप्तपदं हि मित्रम् ||
२१ ख