शान्ति पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
छिन्धि मे संशय़ं देव प्रपन्नाय़ाभिय़ाचते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
छिन्धीतिहासकथनात्परं कौतूहलं हि मे ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
छिन्ध्यस्य दक्षिणं वाहुं छिन्नः सव्यो मय़ा भुजः ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
छिन्ध्यस्य मूर्धानमलं चिरेण; श्रद्धां च राज्याद्धृतराष्ट्रसूनोः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
छिन्नं तु तन्तुवाहुल्यं तन्तुरेकोऽवशेषितः |
१०७ क
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
छिन्नं मूलमनर्थानां मृते तस्मिन्भविष्यति ||
२७ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
छिन्नं वाप्यवरोप्यन्तमवतीर्णमथापि वा |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
छिन्नः कालेन सोऽप्यत्र गन्ता वै नरकं ततः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
छिन्नगात्रावरकरैर्निहतैश्चापि वारणैः |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
छिन्नगात्रैर्विकवचैर्विशिरस्कैः समन्ततः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
छिन्नच्छत्रमहाहंसां मुकुटाण्डजसङ्कुलाम् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
छिन्नत्रिवेणुचक्राक्षान्हतय़ोधाश्वसारथीन् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
छिन्नत्रिवेणुजङ्घेषान्निहतपार्ष्णिसारथीन् |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
छिन्नदन्ताग्रहस्ताश्च भिन्नकुम्भास्तथापरे |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
छिन्नदोषो मुनिर्योगान्युक्तो युञ्जीत द्वादश |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
छिन्नधन्वा ततो द्रौणिः शक्त्या शक्तिमतां वरः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
छिन्नधन्वा महाराज सात्यकिः क्रोधमूर्छितः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
छिन्नध्वजधनुश्छत्रः सहदेवेन सौवलः |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
छिन्नध्वजरथव्राताः केचित्केचित्क्वचित्क्वचित् ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
छिन्नपक्षतय़ा तस्य गमनं नोपपद्यते |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
छिन्नपक्षाः परे ह्यद्य वीर्यहीनाश्च पाण्डवाः ||
२३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
छिन्नभिन्नविपर्यस्तैर्वर्मालङ्कारविग्रहैः |
५२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
छिन्नमञ्जलिकेनाजौ सोत्सेधमपतच्छिरः ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
छिन्नमाज्ञाय़ निस्त्रिंशमवप्लुत्य पदानि षट् |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
छिन्नमूलान्परिभ्रष्टान्कालोपहतचेतसः |
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
छिन्नमूले ह्यधिष्ठाने सर्वे तज्जीविनो हताः |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
छिन्नवर्मध्वजः शूरो निकृत्तः परमेषुभिः ||
६९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
छिन्नवाहुं नरव्याघ्रमर्जुनेन निपातितम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
छिन्नवाहुं परैर्हन्यात्सात्यके स कथं भवेत् ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
छिन्नवाहुः प्राय़गतस्तथा भूरिश्रवा वली |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
छिन्नशीर्षा विदेहाश्च भिन्नजान्वस्थिमस्तकाः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
छिन्नस्कन्धः स विनदन्पपात गजय़ूथपः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५७
भीष्म उवाच
छिन्नस्थूणं वृषं दृष्ट्वा विरावं च गवां भृशम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७९
भरद्वाज उवाच
छिन्नस्य यदि वृक्षस्य न मूलं प्रतिरोहति |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
छिन्नहस्ता महानागाश्छिन्नपादाश्च मारिष |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
छिन्नहस्ता विकवचा विदेहाश्च नरोत्तमाः |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
छिन्ना यथा परशुभिः प्रवृद्धाः शरदि द्रुमाः ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
छिन्नां तां शक्तिमालोक्य भीष्मः क्रोधसमन्वितः |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
छिन्नांश्च तोमरांश्चापान्महामात्रशिरांसि च |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
छिन्नानां चोत्तमाङ्गानां वाहूनां चोरुभिः सह |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
छिन्नानि पट्टिशैश्चापि शिरांसि युधि दारुणे |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
छिन्नान्दृष्ट्वा तु तान्वाणान्प्रद्युम्नेन स सौभराट् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
छिन्नाभ्रमिव गन्तासि विलय़ं मारुतेरितम् |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
छिन्नाभ्राणीव सम्पेतुः सम्प्रविश्य परस्परम् ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
छिन्नाभ्राणीव सम्पेतुर्वध्यमाना महात्मना ||
१०३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
छिन्नाय़ुधं शान्तनवेन राजा; शिखण्डिनं प्रेक्ष्य च जातकोपः |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
छिन्ने धनुषि पार्थेन सोऽन्यदादाय़ कार्मुकम् |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
छिन्ने धनुषि राजेन्द्र शकुनिः सौवलस्तदा |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५३
भीष्म उवाच
छिन्नेऽच्छिन्ने तथा लोभे कारणं काल एव हि ||
११ ख