chevron_left  माय़ाशतसृजौarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
माय़ाशतसृजौ दृप्तौ मोहय़न्तौ परस्परम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
माय़ाश्च विविधाः शक्र साधय़न्त्यविचक्षणम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
माय़ाय़ां तु प्रहीणाय़ाममर्षात्स घटोत्कचः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
माय़ाय़ुद्धे सुकुशलौ माय़ाय़ुद्धमय़ुध्यताम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
माय़ाय़ुद्धेन महता योधय़ामास मां युधि ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९४
भीष्म उवाच
माय़ाय़ुद्धेन माय़ावी इत्येतद्धर्मनिश्चय़ः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
माय़ाय़ुद्धेन माय़ावी सूतपुत्रमय़ोधय़त् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
माय़ूरेण गुणेनैव स्त्रीभिश्चालक्षितश्चरेत् |
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २७४
मातलिरु उवाच
माय़ेय़ं राक्षसस्येति तमुवाच विभीषणः ||
१५ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
माय़ैषा देवराजेन महेन्द्रेण प्रय़ोजिता ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८५
विदुर उवाच
माय़ैषातत्त्वमेवैतच्छद्मैतद्भूरिदक्षिण |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
माय़ोपधः प्रणिधानार्जवाभ्यां; तपोदमाभ्यां धर्मगुप्त्या वलेन |
११ क
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
मिञ्जिकामिञ्जिकं चैव मिथुनं रुद्रसम्भवम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४४
भीष्म उवाच
मितं ददाति हि पिता मितं माता मितं सुतः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
मितं भुङ्क्ते संविभज्याश्रितेभ्यो; मितं स्वपित्यमितं कर्म कृत्वा |
९९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
मिताशनो देवपरः कृतज्ञः; सत्यो मृदुश्चानृशंसः क्षमावान् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
महेश्वर उवाच
मिताशिना सदा भाव्यं सत्पथालम्विना सदा |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
विश्वामित्र उवाच
मित्रं च मे व्राह्मणश्चाय़मात्मा; प्रिय़श्च मे पूज्यतमश्च लोके |
७३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
मित्रं च शत्रुतामेति कस्मिंश्चित्कालपर्यये |
१३५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
मित्रं चामित्रमित्रं च वोद्धव्यं तेऽरिकर्शन ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
मित्रं मिदेर्नन्दतेः प्रीय़तेर्वा; सन्त्राय़तेर्मानद मोदतेर्वा |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
मित्रं सतां सप्तपदं वदन्ति; मित्रद्रोहो नैव राजन्स्पृशेत्त्वाम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
मित्रच्छेदं तथाशाय़ास्ते वै निरय़गामिनः ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
मित्रज्ञाश्च कृतज्ञाश्च सर्वज्ञाः शोकवर्जिताः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
मित्रता सर्वभूतेषु दानमध्ययनं तपः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
मित्रतां च पुरस्कृत्य किञ्चिद्वक्ष्यामि तच्छृणु ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
मित्रतां च पुरस्कृत्य पृच्छामि त्वामहं विभो ||
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
मित्रतामनुवृत्तं तु समुपेक्षेत पण्डितः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४२
व्राह्मण उवाच
मित्रतामभिपन्नस्त्वां किञ्चिद्वक्ष्यामि तच्छृणु ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
मित्रदेवस्त्रिषष्ट्या च चन्द्रदेवश्च सप्तभिः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
मित्रदेवस्य चिच्छेद क्षुरप्रेण महाय़शाः |
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
मित्रद्रुहः कृतघ्नस्य स्त्रीघ्नस्य पिशुनस्य च |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
मित्रद्रुहो दुर्वलभक्तय़ो ये; पापात्मानो न ममैते सहाय़ाः ||
३३ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
मित्रद्रोहस्तानि चत्वारि शक्र; भक्तत्यागश्चैव समो मतो मे ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
मित्रद्रोही कुलाङ्गारः पापकर्मा नराधमः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
युधिष्ठिर उवाच
मित्रद्रोही कृतघ्नश्च यः प्रोक्तस्तं च मे वद ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
मित्रद्रोही कृतघ्नो वै किं भूय़ः श्रोतुमिच्छसि ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
मित्रद्रोही नृशंसश्च कृतघ्नश्च नराधमः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
मित्रद्रोही नैकृतिकोऽनृती वा; पूर्वाशी वा पितृदेवातिथिभ्यः ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
मरुत्त उवाच
मित्रद्रोहे निष्कृतिर्वै यथैव; नास्तीति लोकेषु सदैव वादः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
मित्रद्रोहो न कर्तव्यः पुरुषेण विशेषतः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
मित्रद्रोहो मर्षणीय़ो न मेऽय़ं; त्यक्त्वा प्राणाननुय़ास्यामि द्रोणम् ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
मित्रद्रोहो मर्षणीय़ो न मेऽय़ं; भग्ने सैन्ये यः सहाय़ः स मित्रम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २१०
मार्कण्डेय़ उवाच
मित्रधर्माणमित्येतान्देवानभ्यसृजत्तपः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
मित्रध्रुक्स्याद्धृतराष्ट्रः सपुत्रो; युष्मान्द्विषन्साधुवृत्तानसाधुः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
मित्रध्रुग्दुष्टभावश्च नास्तिकोऽथानृजुः शठः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
मित्रध्रुङ्निरय़ं घोरमनन्तं प्रतिपद्यते ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
मित्रध्रुङ्मद्रको नित्यं यो नो द्वेष्टि स मद्रकः |
७३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
मित्रप्रतीक्षय़ा शल्य धार्तराष्ट्रस्य चोभय़ोः |
१०२ क
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
मित्रवर्मा त्रिसप्तत्या सौश्रुतिश्चापि पञ्चभिः |
९ क