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उद्योग पर्व
अध्याय १८५
भीष्म उवाच
भूतानि चैव सर्वाणि जग्मुरार्तिं विशां पते ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
भूतानि जज्ञिरे तस्मात्प्रलय़ं यान्ति तत्र च ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
भूतानि जातीमरणान्वितानि; जराविकारैश्च समन्वितानि |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
भूतानि त्वा निरीक्षन्ते नूनं चन्द्रमिवोदितम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
भूतानि यस्मान्न त्रसन्ते कदा चि; त्स भूतेभ्यो न त्रसते कदाचित् ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
भूतानि सर्वाणि विधिर्निय़ुङ्क्ते; विधिर्वलीय़ानिति वित्त सर्वे ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
भूतानीव समस्तानि यय़ुः कृष्णनिवेशनम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
भूतानीव समस्तानि राजन्ददृशिरे तदा ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
भूतानुकम्पा ह्यनुशासनं च; युधिष्ठिरे राजगुणाः समस्ताः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
भूतान्तकमिवाय़ान्तं कालदण्डोग्रधारिणम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
भूतान्तरात्मा वरदः सगुणो निर्गुणोऽपि च |
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
भूतान्युपनिविष्टानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
भूतार्थतत्त्व लोकेश जय़ भूतविभावन ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४७
भीष्म उवाच
भूतार्थतत्त्वं तदवाप्य सर्वं; भूतप्रभावाद्भव शान्तवुद्धिः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
भूतालय़ो भूतपतिरहोरात्रमनिन्दितः |
११० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
भूतावासो वासुदेवो सर्वासुनिलय़ोऽनलः |
८९ क
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
भूताश्रय़ो भूतपतिः सर्वभूतनिषेवितः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
भूतिः श्रीर्ह्रीर्धृतिः सिद्धिर्नादक्षे निवसन्त्युत ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
भूतिकर्माणि कुर्वाणं तं जनाः कुर्वते प्रिय़म् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
भूतिमेतानि कुर्वन्ति सतां चाभीक्ष्णदर्शनम् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
श्रीरु उवाच
भूतिर्लक्ष्मीति मामाहुः श्रीरित्येवं च वासव |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
भूतिश्चैव श्रिय़ा सार्धं दक्षे वसति नालसे ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
भूतेभ्यश्चापि पञ्चभ्यो मुक्तो गच्छेत्प्रजापतिम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
भूतेभ्यश्चैव निष्पन्ना मूर्तिमन्तोऽष्ट ताञ्शृणु ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
भूतेषु परिवृत्तिं च पुनरावृत्तिमेव च ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २०६
व्याध उवाच
भूतेष्वभावं सञ्चिन्त्य ये तु वुद्धेः परं गताः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
भूतेष्वभावं सञ्चिन्त्य ये वुद्ध्वा तमसः परम् |
२३ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
भूतैः पिशाचै रक्षोभिर्विविधैश्च निशाचरैः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
भूतैः प्रकृतिमापन्नैस्ततो भूमौ निमज्जति ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
भूतोऽथ वा भविष्यो वा रथः कश्चिन्मय़ा श्रुतः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
भूत्यर्थं सर्वभूतानां पद्मा श्रीः पद्ममालिनी ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
भूत्वा च न भवत्येतदभूत्वा च भवत्यपि |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
भूत्वा च व्राह्मणः साक्षाद्वरय़ामास तं नृपम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
भूत्वा तद्विजय़े शक्तावशक्ताविव पश्यतः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
भूत्वा त्वमन्धो नचिरादनन्धो भविष्यसीति |
१३० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
भूत्वा मीनोऽष्ट वर्षाणि मृगो जाय़ति भारत |
६० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
भूत्वा हि कौरवाः पार्थ प्रभूतगजवाजिनः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
भूत्वा हि जगतो नाथो ह्यनाथ इव मे सुतः |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
भूत्वा हि नृपतिः पूर्वं समाज्ञाप्य च मेदिनीम् |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
भूत्वा हि विपुला सेना तावकानां परैः सह |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
भूत्वामृतं प्रदास्यामि भार्गवाय़ महात्मने ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२५
भीष्म उवाच
भूत्वैकाग्रमना विप्र ऊर्ध्ववाहुर्महामुनिः |
३ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
भूतय़क्षपिशाचाश्च किंनराः समहोरगाः ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
भूतय़क्षविहङ्गानां पन्नगानां च सर्वशः ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९७
नारद उवाच
भूतय़े सर्वभूतानामचरत्तप उत्तमम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
भूपतिर्भुवभर्ता च जनय़त्पावकं परम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
भूपतिर्भुवभर्ता च महतः पतिरुच्यते ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
भूमावद्य कथं शेषे विप्रविद्धः सुखोचितः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
भूमावनाथवच्छेते नूनं नाथवतां वरः ||
३७ ख