अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
महान्कुशिकवंशश्च व्रह्मर्षिशतसङ्कुलः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
महान्क्लेशो हि भवति तस्मान्नोपदिशेत्क्वचित् ||
७० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
महान्तं च रणे शव्दं दीर्यमाणां च भारतीम् ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
महान्तं चाप्यहङ्कारमविद्यासर्गमेव च ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
महान्तं नरकं घोरमप्रतिष्ठमचेतसः |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
महान्तं निश्चय़ं कृत्वा लुव्धकः प्रविवेश ह |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
महान्तं भरतश्रेष्ठ सुस्फीतजनसङ्कुलम् |
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
महान्तं भारमुद्यम्य विश्रुतं सार्वलौकिकम् |
७१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
महान्तमप्यर्थमधर्मय़ुक्तं; यः सन्त्यजत्यनुपाक्रुष्ट एव |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
महान्तमिव मैनाकमसह्यं भुवि पातितम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
महान्तमेतं भारं च मन्ये तद्व्रूहि पार्थिव ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
महान्तमेतमर्थं मां यं त्वं पृच्छसि विस्मय़ात् |
५० क
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
महान्ति चान्यानि सरांसि पार्थाः; सम्पश्यमानाः प्रय़युर्नराग्र्याः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
महान्ति यूथानि महाद्विपानां; तस्मिन्वने राष्ट्रपतिर्ददर्श ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
महान्ति शस्त्राणि च भीमदर्शनाः; प्रगृह्य पार्थं सहसाभिदुद्रुवुः ||
८८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
महान्तो यत्र विविधाः प्रासादाः पर्वतोपमाः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
महान्त्यनीकानि महासमुच्छ्रय़े; समागमे पाण्डवधार्तराष्ट्रय़ोः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
महान्त्यनीकानि महासमुच्छ्रय़े; समागमे पाण्डवधार्तराष्ट्रय़ोः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
महान्दाशरथः पन्था मा राजन्कापथं गमः ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
महान्दुर्योधनस्यासीन्नागो मणिमय़ो ध्वजः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
महान्दैवकृतस्तत्र दण्डः पतति दारुणः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
महान्धर्मो महाराज शरणागतपालने |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
महान्नादो ह्यभूत्तत्र दृष्ट्वा राजानमाहवे ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
महान्भवत्यनिर्विण्णः सुखं चात्यन्तमश्नुते ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
महान्महात्मा सर्वात्मा नाराय़ण इति श्रुतः ||
२५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
उमो उवाच
महान्मे संशय़ः कश्चिन्मर्त्यान्प्रति महेश्वर |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
महान्वनतरुर्विद्धो मृगं तत्र जिघांसता ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
महान्व्यतिकरो घोरः सेनय़ोः समपद्यत ||
७२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
महान्व्यतिकरो रौद्रः सेनय़ोः समपद्यत ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
महान्व्यतिकरो रौद्रो योधानामन्वदृश्यत |
११६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
महान्सन्धारय़त्येतच्छरीरं वाय़ुना सह |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
महान्समभवच्छव्दो गिरीणामिव दीर्यताम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
महान्सुतुमुलः शव्दो वभूव रथिनां तदा ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
महान्स्यात्संशय़ो लोके न तु पश्यामि नो जय़म् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
महान्हि वर्तते रौद्रः सङ्ग्रामो लोमहर्षणः ||
६१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
महानय़ं कृष्ण कृतः क्षत्रस्य समुदानय़ः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
युधिष्ठिर उवाच
महानय़ं धर्मपथो वहुशाखश्च भारत |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
युधिष्ठिर उवाच
महानय़ं धर्मपथो वहुशाखश्च भारत |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
महापदानि कत्थसे न चाप्यवेक्षसे परम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
महापराधा ह्यप्यस्मिन्विश्वसन्ति हि शत्रवः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
महापराधे ह्यपि संनतेन; महर्षिणाहं गुरुणा च शप्तः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
महापातकवर्जं तु प्राय़श्चित्तं विधीय़ते ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
महापादो महाहस्तो महाकाय़ो महाय़शाः ||
८२ ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
महापापानि कर्माणि यानि केवलसाहसात् |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
महापाशोद्यतकरास्तथा लगुडपाणय़ः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
महापुर उपस्पृश्य त्रिरात्रोपोषितो नरः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
महापुराणः सम्भाव्यः प्रत्यङ्गः परहा श्रुतिः ||
१७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
महापुरुषमव्यक्तं स नो वक्ष्यति यद्धितम् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
महापुरुषशव्दं स विभर्त्येकः सनातनः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
महापुरुषसञ्ज्ञां स लभते स्वेन कर्मणा ||
२४ ख