द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
मनसा चिन्तय़ामास तन्मे सम्पद्यतामिति ||
७८ ग
विराट पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
मनसा चिन्तय़ामास प्रसादं पावकस्य च |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
मनसा चेन्द्रिय़ग्राममनन्तं प्रतिपद्यते ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
मनसा तं वहन्भारं तमेवार्थं विचिन्तय़न् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
मनसा तस्य सर्वाणि वाहनान्याय़ुधानि च |
९० ख
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
मनसा ता गिरः सर्वाः प्रत्यगृह्णात्तपस्विनाम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
मनसा तात पर्येति क्रमशो विषय़ानिमान् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
मनसा तानि गच्छेत सर्वतीर्थसमीक्षय़ा ||
८८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
मनसा तानि गम्यानि सर्वतीर्थसमासतः ||
६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
मनसा तु प्रदुष्टेन नग्नां पश्यन्ति ये स्त्रिय़म् |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३
भीष्म उवाच
मनसा त्रिविधं चैव दश कर्मपथांस्त्यजेत् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२७८
सावित्र्यु उवाच
मनसा निश्चय़ं कृत्वा ततो वाचाभिधीय़ते |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
मनसा पूजय़ामास भूरिश्रवसमाहवे ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
मनसा प्रार्थितान्कामाँल्लभते नात्र संशय़ः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
मनसा भावगम्भीरं मार्जारं वाक्यमव्रवीत् ||
१८२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
उमो उवाच
मनसा वध्यते येन कर्मणा पुरुषः सदा |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
मनसा विपरीतेन निरय़ं प्रतिपद्यते ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
मनसा विहिते पुण्ये विस्तीर्णे नगरोपमे |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
मनसा स च मे प्रश्नो दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
मनसा स मुहूर्तं वै रणे समभिहर्षय़न् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
मनसा सन्नगात्रोऽभूद्यथा सैकतमम्भसि ||
७४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
मनसा सम्प्रदीप्तेन महानात्मा प्रकाशते ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
मनसा सुविशुद्धेन प्रेत्यानन्तफलं स्मृतम् ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
मनसाथ प्रदीपेन व्रह्मज्ञानवलेन च |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
मनसान्यस्य भवति वाचान्यस्योत कर्मणा |
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
मनसापि गुरोर्भार्यां यः शिष्यो याति पापकृत् |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
मनसापि न हिंसन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
मनसापि न हिंसन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
मनसापि हि दुर्धर्षौ सेनामेतां यशस्विनौ |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
मनसाप्यभिकामस्य कुरुक्षेत्रं युधिष्ठिर |
५ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
मनसाप्यभिकामस्य पुष्कराणि मनस्विनः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
८७
धौम्य उवाच
मनसाप्यभिकामस्य पुष्कराणि मनस्विनः |
१५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
मनसाप्यसुचिन्त्येन दुष्करेणाल्पचेतसा |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११७
नारद उवाच
मनसाभिप्रतीतेन कन्यामिदमुवाच ह ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
मनसाभिवृतः पूर्वं मय़ा त्वं पार्थिवर्षभ ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
मनसार्थान्विनिश्चित्य पश्चात्प्राप्नोति कर्मणा |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
मनसाहं प्रपश्यामि व्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
मनसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति |
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भरद्वाज उवाच
मनसि व्याकुले तद्धि पश्यन्नपि न पश्यति ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
मनसैकेन ते युद्धमिदं घोरमुपस्थितम् ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
मनसैकेन योद्धव्यं तत्ते युद्धमुपस्थितम् |
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
मनसैव प्रदीपेन महानात्मनि दृश्यते ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
मनसैव विशिष्टात्मा नय़त्यात्मवशं वशी ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
मनसैव हि भूतानि धाता प्रकुरुते वशे ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
मनसैवेन्द्रिय़ग्रामं विनिय़म्य समन्ततः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
मनसो दुःखमूलं तु स्नेह इत्युपलभ्यते |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
मनसो महती वुद्धिर्वुद्धेः कालो महान्स्मृतः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
अलर्क उवाच
मनसो मे वलं जातं मनो जित्वा ध्रुवो जय़ः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
मनसो लक्षणं चिन्ता तथोक्ता वुद्धिरन्वय़ात् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२५
व्यास उवाच
मनसो व्यक्तमव्यक्तं व्राह्मः स प्रतिसञ्चरः ||
१० ख