भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
मुष्टिदेशे शरैस्तीक्ष्णैस्त्रिभी राजा हसन्निव ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
मुष्टिना पाण्डवो राजन्दृढेन सुपरिष्कृतम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
मुष्टिनाभिहतस्तेन प्रचचाल घटोत्कचः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
मुष्टिनाहत्य सङ्क्रुद्धो ममर्द चरणेन च ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
मुष्टिभिर्जानुभिश्चैव तलैश्चैव विशां पते |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
मुष्टिभिर्जानुभिश्चैव निघ्नन्तावितरेतरम् |
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
मुष्टिभिर्वज्रसंस्पर्शैर्धूममुत्पादय़न्मुखे |
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
मुष्टिभिर्वज्रसंह्रादैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
मुष्टिभिश्च महाघोरैरन्योन्यमभिपेततुः |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
मुष्टिश्च ते यथापूर्वं भुजय़ोश्च वलं तव ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
मुष्टिश्लिष्टाय़ुधाभ्यां च व्याय़ताभ्यां महद्धनुः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
मुष्टिय़ुद्धं निय़ुद्धं च देहपाप्मविनाशनम् ||
६० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
मुष्टिय़ुद्धं महच्चासीद्योधानां तत्र भारत |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
मुष्णन्क्षत्रिय़तेजांसि नक्षत्राणामिवांशुमान् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
मुष्णन्ती प्रभय़ा राज्ञां चक्षूंषि च मनांसि च ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१०
मार्कण्डेय़ उवाच
मुष्णन्त्यत्र स्थिता ह्येते स्वर्गतो यज्ञय़ाजिनः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६९
वसिष्ठ उवाच
मुष्णन्दृष्टीः क्षत्रिय़ाणां मध्याह्न इव भास्करः |
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
मुसलं परशुश्चक्रं प्रासो दण्डर्ष्टितोमराः ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
मुसलं पाण्डुपुत्राय़ चिक्षेप परिघोपमम् ||
२८ ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
मुसलं समवष्टभ्य तस्थौ स मधुसूदनः ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
मुसलानि भुशुण्डीश्च शक्तिऋष्टिपरश्वधान् ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
मुसलानीव निष्पेतुः परिघा इव चेषवः |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
मुसलानीव मे घ्नन्ति नेमे वाणाः शिखण्डिनः ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
मुसलालातनाराचतोमरासिपरश्वधैः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
मुसलैः पर्वताग्रैश्च तावन्योन्यं निजघ्नतुः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
मुसलैर्मुद्गरैश्चक्रैर्भिण्डिपालैः परश्वधैः |
५५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
मुहुरन्तर्दधाते तौ वाणवृष्ट्या परस्परम् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
मुहुरभ्युत्स्मय़न्भीष्मः प्रहस्य स्वनवत्तदा ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
मुहुराजघ्नतुः क्रुद्धावन्योन्यमरिमर्दनौ ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
मुहुरालीय़ते भीता मुहुः क्रोशति रोदिति ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
मुहुरुत्पतता चैव संमोहः समजाय़त ||
७९ ग
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
मुहुरुत्पतते वाला मुहुः पतति विह्वला |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
मुहुरुत्पततो दिक्षु धावतश्च यशस्विनः |
५७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
मुहुरुष्णं च निःश्वस्य न स तं प्रत्यभाषत ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
मुहुरुष्णं विनिःश्वस्य सुसम्भ्रान्तस्तपोधनः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
मुहुर्मुहुः क्रोधवशात्प्रावेपत च पाण्डवः ||
५४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
मुहुर्मुहुः प्रणदतस्तस्य शङ्खस्य भारत |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
मुहुर्मुहुः प्रस्फुरति दक्षिणोऽस्य भुजस्तथा ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
मुहुर्मुहुः प्रेक्षमाणा युध्यमाना महौजसम् ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
मुहुर्मुहुरुदीर्यन्तः कम्पय़न्ति हि मामकान् ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
मुहुर्मुहुर्मुह्यमानः पुत्राधिभिरभिप्लुतः ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
मुहुर्मुहुर्वज्रधरो वाहू संस्फालय़ञ्शनैः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
मुहुर्मुहुर्व्यालवदुच्छ्वसन्तो; ज्यां विक्षिपन्तश्च महाधनुर्भ्यः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
मुहुर्मुहुश्च भूतानि प्राव्यथन्त भय़ात्तथा ||
४० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
मुहूर्तं चिन्तय़ामास किं त्वेतदिति मारिष ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
मुहूर्तं चिन्तय़ामास मन्युनाभिपरिप्लुतः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
मुहूर्तं चिन्तय़ामास वाष्पशोकसमाकुलः ||
७८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
मुहूर्तं चिन्तय़ित्वा तु ततो दारुणमाहवम् ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
मुहूर्तं चैव तद्युद्धं समरूपमिवाभवत् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
मुहूर्तं ज्वलितं श्रेय़ो न तु धूमाय़ितं चिरम् ||
१३ ग