उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
मुचुकुन्दस्य राजर्षेरददात्पृथिवीमिमाम् |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
मुचुकुन्दस्य संवादं राज्ञो वैश्रवणस्य च ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
मुचुकुन्दान्मरुत्तश्च मरुत्तादपि रैवतः |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
मुचुकुन्दो विजित्येमां पृथिवीं पृथिवीपतिः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
मुचुकुन्दोऽथ मान्धाता मरुत्तश्च महीपतिः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
मुच्यतां जानकी सीता न मे मोक्ष्यसि कर्हिचित् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
मुच्यतां त्रिदशेन्द्रोऽय़ं मत्प्रिय़ं कुरु भामिनि |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
मुच्यतां सञ्जय़ो जीवन्न हन्तव्यः कथञ्चन ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
मुच्यते वन्धनात्पुष्पं फलं वृन्तात्प्रमुच्यते |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४६
युधिष्ठिर उवाच
मुच्यते स कथं तस्मादेनसस्तद्वदस्व मे ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
मुच्यते सर्वपापेभ्यः स्वस्तिमांश्च गृहान्व्रजेत् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
मुच्यते सर्वपापेभ्यस्तमोभ्य इव चन्द्रमाः ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
मुच्यते सर्वपापेभ्यो महाभ्रैरिव चन्द्रमाः ||
५२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
मुच्यन्ते किं न मुच्यन्ते पदे परमके स्थिताः ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
मुच्यन्ते भय़कालेषु मोक्षय़न्ति च ये परान् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
मुच्यस्व महतो भारात्त्यागमेवाभिसंश्रय़ ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
मुच्येत्तथातुरो रोगाद्दुःखान्मुच्येत दुःखितः ||
७४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
मुच्येदार्तस्तथा रोगाच्छ्रुत्वेमामादितः कथाम् |
११८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
मुञ्च भार्यामुतथ्यस्येत्यथ तं वरुणोऽव्रवीत् |
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
मुञ्च मुञ्च शिनेः पौत्रं भीम युद्धमदान्वितम् |
५५ क
सभा पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
मुञ्च वा नृपतीन्सर्वान्मा गमस्त्वं यमक्षय़म् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
मुञ्च शस्त्रमिति प्राह कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
मुञ्चन्क्रोधविषं तीक्ष्णं प्रस्थलाधिपतिं प्रति ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
मुञ्चन्तं विपुलं नादं सतोय़मिव तोय़दम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
मुञ्चन्तः शरवर्षाणि तपान्ते जलदा इव ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
मुञ्चन्ति च रसं राजंस्तस्मिन्रजतसंनिभम् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
मुञ्चन्त्यङ्गारवर्षाणि भेर्योऽथ पटहास्तथा ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
मुञ्चन्त्वानन्दजाश्रूणि दाशार्हप्रमुखा नृपाः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
मुञ्चन्निषुगणांस्तीक्ष्णाँल्लघुहस्तो दृढव्रतः |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
मुञ्चस्वेत्यव्रवीत्पार्थं स मुमोचाविचारय़न् ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
मुञ्चेच्छां कामभोगेषु मुञ्चेमं श्रीभवं मदम् |
६४ क
सभा पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
मुञ्चैनं भीष्म पश्यन्तु यावदेनं नराधिपाः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२५६
भीमसेन उवाच
मुञ्चैनमधमाचारं प्रमाणं यदि ते वय़म् ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
मुञ्जं शरीरं तस्याहुरिषीकामात्मनि श्रिताम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
मुञ्जकेश इति ख्यातः श्रीमानासीत्स पार्थिवः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
मुञ्जकेशो हरिश्मश्रुः सर्वभूतपितामहः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
भीष्म उवाच
मुञ्जपृष्ठ इति प्रोक्तः स देशो रुद्रसेवितः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
मुञ्जपृष्ठं गय़ां चैव निरृतिं देवपर्वतम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
भीष्म उवाच
मुञ्जपृष्ठं जगामाथ देवर्षिगणपूजितम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
मुञ्जमेखलनग्नत्वं क्षौमकृष्णाजिनानि च ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
मुञ्जवज्जर्जरीभूता वहवस्तत्र पादपाः |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
मुञ्जवल्वजवंशादि द्रव्यं सर्वं घृतोक्षितम् ||
१४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
मुण्डतालवनानीव चकार स रथव्रजान् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
मुण्डतालवनानीव चकार स रथव्रजान् ||
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
मुण्डतालवनानीव तत्र तत्र चकाशिरे |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
मुण्डा निस्तन्तवश्चापि वसन्त्यर्थार्थिनः पृथक् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सात्यकिरु उवाच
मुण्डानीके हते सूत सर्वसैन्येषु चासकृत् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सात्यकिरु उवाच
मुण्डानेतान्हनिष्यामि दानवानिव वासवः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
मुण्डार्धमुण्डजटिलानशुचीञ्जटिलाननान् |
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डिमुण्डो विकुर्वणः |
१२८ क