उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
मातुलो भीमसेनस्य सेनजिच्च महारथः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
मातुश्च परमेष्वासस्तौ च नामास्य चक्रतुः ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
मातुश्च यौतकं यत्स्यात्कुमारीभाग एव सः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
मातुश्च वचनात्क्षत्ता सभां प्रावेशय़त्पुनः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३२
व्रह्मो उवाच
मातुश्चाप्यपराधाद्वै भ्रातृणां ते महद्भय़म् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
मातुश्चिकीर्षितं राजन्नृचीकस्तामथाव्रवीत् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
मातृजात्यां प्रसूय़न्ते प्रवरा हीनय़ोनिषु ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
मातृतः पितृतश्चैव तस्मात्पूज्यतमो गुरुः |
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
मातृतीर्थं च तत्रैव यत्र स्नातस्य भारत |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
मातृपितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च |
३८ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
मातृभिः सह धर्मात्मा कृत्वोदकमतन्द्रितः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
मातृभ्यां सममिच्छामि नकुलो यक्ष जीवतु ||
७३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
मातृभ्यां सहितो धीमान्कुरूनभ्याजगाम ह ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
मातृवत्स्वसृवच्चैव नित्यं दुहितृवच्च ये |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
मातृशापाभिभूतानां ज्ञातीनां मम सत्तम |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
मातृशुश्रूषय़ा शूरा भैक्ष्यशूरास्तथापरे ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
मातृषष्ठास्तु ते तेन गुरुणा सङ्गतास्तदा |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
मातृष्वसुः सुता वीराः पाण्डवानां जय़ार्थिनः |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
मातॄणां प्रेक्षतीनां च भद्रशाखश्च कौशलः |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
मातॄरन्ये पितॄनन्ये भ्रातॄनन्ये विचुक्रुशुः |
११५ क
विराट पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
मातेव परिपाल्या च पूज्या ज्येष्ठेव च स्वसा ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
मातेव भोजय़ित्वाग्रे शिष्टमाहारय़त्तदा ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
मात्मानमवमन्यस्व मैनमल्पेन वीभरः |
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
मात्रा चास्मि समादिष्टो निषादान्भक्षय़ेति वै |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
मात्रा पित्रा च विहितां सदा गार्हस्थ्यभागिनीम् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
मात्रा पित्रा च सुभृशं दुःखिताभ्यामहं पुरा |
८३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
मात्रा पित्रा सुतैर्दारैर्विय़ुक्तस्य धनेन वा |
७४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
मात्रा मुहूर्ताश्च लवाः क्षणाश्च; विष्वक्सेने सर्वमेतत्प्रतीहि ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
मात्रा सह प्रदग्धव्याः पाण्डवाः पुरुषर्षभाः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
मात्रा सहैकचक्राय़ां व्राह्मणस्य निवेशने ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
मात्रा हि भुजगाः शप्ताः पूर्वं व्रह्मविदां वर |
३५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
मात्राभिरनुरूपाभिरनुग्राह्या हितास्त्वय़ा ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
स्यूमरश्मिरु उवाच
मात्राभिर्धर्मलव्धाभिर्ये वा त्यागं समाश्रिताः ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
मात्राशी कालमाकाङ्क्षंश्चरेद्भैक्ष्यं समाहितः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
मात्रासि व्यंसिता भद्रे चरुव्यत्यासहेतुना |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय़ शीतोष्णसुखदुःखदाः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
मात्रे तत्सर्वमाचख्यौ सा कन्या राजसत्तमम् |
२२ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
मात्रोः साम्यमभीप्सन्वै नकुलं जीवमिच्छसि ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
मात्रोरभ्युपपत्तिश्च धर्मोपनिषदं प्रति |
६९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
मात्सर्यात्स्वादुकामेन नृशंसेन वुभूषता ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
भीमसेन उवाच
मादीर्घं क्षम कालं त्वं मासमध्यर्धसंमितम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
मादृशः प्रसृजेत्कस्मात्सुय़ोधनवधादपि ||
१५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
मादृशैर्युध्यमानानामेतच्चान्यच्च विद्यते ||
७८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
माद्रीं खल्वलङ्कृतां दृष्ट्वा पाण्डुर्भावं चक्रे ||
७३ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
माद्रीं मैथुनधर्मेण गच्छमानो वलादिव ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
माद्रीपुत्रं नकुलं त्वाजमीढं; महेन्द्रदत्ता हरय़ो वाजिमुख्याः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
माद्रीपुत्रं सुसंहृष्टो दशभिर्निशितैः शरैः |
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
माद्रीपुत्रः सहदेवः कलिङ्गा; न्समागतानजय़द्दन्तकूरे |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
माद्रीपुत्रः सहदेवो मुखमालिप्य गच्छति ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
माद्रीपुत्रस्तु नकुलः शूरः सङ्क्रन्दनो युधि |
७ क