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शल्य पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
मूर्ध्नि चैतावुपाघ्राय़ कुशलं पर्यपृच्छत ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
मूर्ध्नि चैतावुपाघ्राय़ संहृष्टः शिविरं यय़ौ ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय़ देवेन्द्रः परवीरहा |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय़ निषीदेत्यव्रवीत्तदा ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय़ परिष्वज्य च वाहुना |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय़ सस्नेहं परिषस्वजे |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
मूर्ध्नि तान्समुपाघ्राय़ प्रेम्णाभिवद पार्थिव ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
मूर्ध्नि तेनाप्युपाघ्रातस्तस्मै सर्वं न्यवेदय़त् ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
मूर्ध्नि तेषां कृतः पादो दिष्ट्या ते स्वेन कर्मणा ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय ८
सुदेष्णो उवाच
मूर्ध्नि त्वां वासय़ेय़ं वै संशय़ो मे न विद्यते |
२० क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
मूर्ध्नि पुत्रानुपाघ्राय़ प्रतिनन्दन्ति मानवाः ||
६० ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
दुर्योधन उवाच
मूर्ध्नि स्थितममित्राणां को नु स्वन्ततरो मय़ा ||
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
मूर्ध्नि स्थितममित्राणां जीवतामेव सञ्जय़ ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
मूर्ध्न्याधाय़ात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
मूर्ध्न्युपाघ्राय़ चैवैनमिदं पुनरुवाच ह ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४६
भीष्म उवाच
मूलं फलं वा पर्णं वा पय़ो वा द्विजसत्तम |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
युधिष्ठिर उवाच
मूलं योगं गतिं कालं कारणं हेतुमेव च ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
मूलं रुन्धीन्द्रिय़ग्रामं शकुन्तानिव पञ्जरे ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
भीष्म उवाच
मूलं लोभस्य महतः कालात्मगतिरेव च |
११ क
सभा पर्व
अध्याय ४६
जनमेजय़ उवाच
मूलं ह्येतद्विनाशस्य पृथिव्या द्विजसत्तम ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
मूलकर्मक्रिय़ा चात्र माय़ा योगश्च वर्णितः |
७३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
मूलगोत्राणि चत्वारि समुत्पन्नानि पार्थिव |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
मूलघातिषु सज्जन्ते वुद्धिमन्तो भवद्विधाः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
मूलप्रकृतय़ोऽष्टौ ता जगदेतास्ववस्थितम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
मूलप्रवादैर्हि विषं प्रय़च्छन्ति जिघांसवः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
मूलमेतत्त्रिवर्गस्य निवृत्तिर्मोक्ष उच्यते ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
वृहस्पतिरु उवाच
मूलमेतद्धि धर्माणां प्रदानस्य च भारत ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
मूलमेवादितश्छिन्द्यात्परपक्षस्य पण्डितः |
११ क
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
मूलमेषां महत्कृत्तं सारार्थी चन्दनं यथा |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
उमो उवाच
मूलवत्सु च देशेषु वसन्ति निय़तव्रताः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
मूलस्थाय़ी स भगवान्स्वेनानन्तेन तेजसा |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
मूलान्यस्य प्रशाखाश्च दहन्समनुगच्छति ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
मूलाहारा निराहाराः साश्मकुट्टा मरीचिपाः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
मूले त्वारोग्यमर्च्छेत यशोऽषाढास्वनुत्तमम् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
मूले निक्षिप्य कौरव्यं युय़ुत्सुं धृतराष्ट्रजम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
मूले मूलफलं दत्त्वा व्राह्मणेभ्यः समाहितः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
मूलैरेके फलैरेके पुष्पैरेके दृढव्रताः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
मूलो विशालो ह्यमृतो व्यक्ताव्यक्तस्तपोनिधिः |
१२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११६
नारद उवाच
मूल्येनापि समं कुर्यां तवाहं द्विजसत्तम |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
मूषकं मन्दमुद्वीक्ष्य मार्जारो लोमशोऽव्रवीत् ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
मूषकश्च विडालश्च मुक्तावन्योन्यसंश्रय़ात् ||
१९३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
मूषका स्तनवालाश्च सतिय़ः पत्तिपञ्जकाः |
६२ क
आदि पर्व
अध्याय ३१
सूत उवाच
मूषकादः शङ्खशिराः पूर्णदंष्ट्रो हरिद्रकः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३
सूत उवाच
मूषकेन निगूढेन गर्तेऽस्मिन्नित्यवासिना ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
मृगं चासाद्य रथेनान्वधावत् ||
४४ क
वन पर्व
अध्याय १३९
लोमश उवाच
मृगं तु मन्यमानेन पिता वै तेन हिंसितः |
६ क
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
मृगं हरिरिवादृश्यः प्रत्याकाङ्क्षत्स कीचकम् ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय १०९
वैशम्पाय़न उवाच
मृगः पाण्डुश्च शोकार्तः क्षणेन समपद्यत ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
मृगद्विजसमाकीर्णा पाण्डवानां महात्मनाम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
मृगद्विजसमाकीर्णे तापसालय़भूषिते ||
३ ख