शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
मृत्युमावार्य तरसा शरप्रस्तरशाय़िनः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
मृत्युरस्य महावाहो रणे देवकिनन्दनः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
मृत्युरात्मा च लोकाश्च जिता भूतानि पञ्च च |
८९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
मृत्युरात्मेच्छय़ा यस्य जातस्य मनुजेष्वपि |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
११७
राम उवाच
मृत्युरेवंविधो युक्तः सर्वभूतेष्वनागसः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
मृत्युर्ग्रसति भूतानि पवनं पन्नगो यथा ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
मृत्युर्जरा च व्याधिश्च दुःखं चानेककारणम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
२२२
शार्ङ्गका ऊचुः
मृत्युर्नो विलवासिभ्यो भवेन्मातरसंशय़म् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
सावित्र्यु उवाच
मृत्युर्मे भर्तुराख्यातो नारदेन महात्मना |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
मृत्युर्यमो हुताशश्च कालः संहारवेगवान् |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय
१९३
दुर्योधन उवाच
मृत्युर्विधीय़तां छन्नैः स हि तेषां वलाधिकः ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
मृत्युर्हन्तास्य शस्त्रेण स चोत्पन्नो नराधिप ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
मृत्युश्चैव प्राणिनामन्तकाले; साक्षात्कृष्णः शाश्वतो धर्मवाहः |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
मृत्युस्त्वं चैव हेतुर्हि जन्तोरस्य विनाशने |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
मृत्युय़ानं समारुह्य गता वैवस्वतक्षय़म् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
नारद उवाच
मृत्यो इति महीपाल जहि चेमाः प्रजा इति ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
सर्प उवाच
मृत्यो विदोषः स्यामेव यथा तन्मे प्रय़ोजनम् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
पितामह उवाच
मृत्यो सङ्कल्पिता मे त्वं प्रजासंहारहेतुना |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
मृत्योः श्रुतं मे वचनं तव चैव भुजङ्गम |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
मृत्योः स्वसारं ज्वलितामिवोल्कां; वैकर्तनः प्राहिणोद्राक्षसाय़ ||
५४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
मृत्योरास्यं व्यात्तमिवान्वपद्य; न्प्रभद्रकाः कर्णमासाद्य राजन् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
मृत्योरास्यमनुप्राप्तं धृष्टद्युम्नममंस्महि ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
मृत्योरास्यमनुप्राप्तं मेनिरे च युधिष्ठिरम् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
वासुदेव उवाच
मृत्योरास्यान्तरान्मुक्तं पश्याम्यद्य धनञ्जय़म् ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
मृत्योरिव जुगुप्सेत राजस्वहरणान्नरः ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
मृत्योरिवान्तिकं प्राप्तौ सर्वभूतानि मेनिरे ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
मृत्योरुपान्तिकं प्राप्तौ माद्रीपुत्रौ स्म मेनिरे ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
मृत्योर्मुखगतं मन्ये कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
मृत्योर्ये ते व्याधय़श्चाश्रुपाता; मनुष्याणां रुज्यते यैः शरीरम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
मृत्योर्वा गृहमेवैतद्या ग्रामे वसतो रतिः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
२०१
पितामह उवाच
मृत्योर्विधानमेतच्च यथावद्वां भविष्यति ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
मृत्योर्वै किङ्करो दण्डस्तापो वह्नेः सुदारुणः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
मृत्योश्चतुर्विभागस्य दुःखस्य च सुखस्य च ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
मृत्योस्तु दुहिता राजन्सुनीथा नाम मानसी |
९९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
मृदङ्गकेतोस्तस्य त्वं तेजसा निहतः पुरा |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
मृदङ्गपणवोद्घुष्टं शङ्खभेरीनिनादितम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
मृदङ्गभेरीपटहप्रणादा; नेमिस्वना दुन्दुभिनिस्वनाश्च |
१०४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
मृदङ्गभेरीपणवानकस्वनै; र्निनादिते भारत शङ्खनिस्वनैः |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
मृदङ्गवरनादेन रथनेमिस्वनेन च |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
मृदङ्गशङ्खशव्दैश्च मनोरममभूत्तदा ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
मृदङ्गा झर्झरा भेर्यः पणवानकगोमुखाः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
मृदङ्गानकशङ्खानां मर्दलानां च निस्वनैः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
मृदङ्गेषु च राजेन्द्र वाद्यमानेष्वनेकशः ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
मृदमापस्तथाश्मानं पत्रपुष्पफलानि च |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
मृदवः सत्यभूय़िष्ठा अल्पद्रोहाल्पमन्यवः |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
मृदितानीव पद्मानि प्रम्लाना इव च स्रजः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
मृदु चात्महितं चैव सापेक्षमिदमुक्तवान् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
मृदु दुर्योधने वाक्यं यो व्रूय़ात्पापचेतसि ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
धृतराष्ट्र उवाच
मृदु वा यदि वा तीक्ष्णं तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
मृदु वै मन्यते पापो भाष्यमाणमशक्तिजम् |
६ क