आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
मेरुं पर्वतमासाद्य हिमवत्पार्श्व उत्तरे |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
मेरुं प्रदक्षिणं कृत्वा सम्प्रय़ात्युत्तरान्कुरून् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
मेरुः पर्वतराड्यत्र देवोद्यानानि मुद्गल ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
मेरुप्रपातं प्रपतञ्ज्वलनं वा समाविशन् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भरद्वाज उवाच
मेरुमध्ये स्थितो व्रह्मा तद्व्रूहि द्विजसत्तम ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
मेरुमन्दरय़ोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
मेरुरुत्तममध्यानामधमानां च पक्षिणाम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
मेरुर्महेन्द्रो मलय़ः श्वेतश्च रजताचितः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
मेरुशृङ्गे किल पुरा कर्णिकारवनाय़ुते |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९२
भीष्म उवाच
मेरुशृङ्गे समासीनं पितामहमुपागमन् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
मेरोः पार्श्वमहं पूर्वं वक्ष्याम्यथ यथातथम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
मेरोः पार्श्वे नगेन्द्रस्य सर्वर्तुकुसुमावृतम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
मेरोः समुद्रस्य च सर्वरत्नैः; सङ्ख्योपलानामुदकस्य वापि |
९७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
मेरोः सहस्रैः स हि योजनानां; द्वात्रिंशतोर्ध्वं कविभिर्निरुक्तः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
मेरोरग्रे यद्वनं भाति रम्यं; सुपुष्पितं किंनरगीतजुष्टम् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
मेरोरथोत्तरं पार्श्वं पूर्वं चाचक्ष्व सञ्जय़ |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
मेरोरिव नगेन्द्रस्य काञ्चनस्य महाद्युतेः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
मेरोरुत्तरभागे तु क्षीरोदस्यानुकूलतः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
मेरोर्हरेश्च द्वे वर्षे वर्षं हैमवतं तथा |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
मेरोस्तु पश्चिमे पार्श्वे केतुमालो महीपते |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
मेरौ गिरिवरे रम्ये सिद्धचारणसेविते ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
मेरौ समागता देवाः श्राविताश्चेदमुत्तमम् ||
१०९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
मेषवक्त्रास्तथैवान्ये तथा छागमुखा नृप ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
मैत्रदृष्टिः पितृसमो निर्वैरो निय़तेन्द्रिय़ः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
मैत्राः क्रूराणि कुर्वन्तो जय़न्ति स्वर्गमुत्तमम् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
मैत्राणामृजुवुद्धीनामय़ं गिरिवरः शुभः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
मैत्रान्साधून्वेदविदः शीलवृत्ततपोन्वितान् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
भीष्म उवाच
मैत्रावरुणिमासीनमभिवाद्य कृताञ्जलिः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
मैत्रीं वुद्धिं समास्थाय़ शुद्धास्तीर्थानि गच्छत ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
मैत्रे नक्षत्रय़ोगे स्म सहितः सर्वय़ादवैः ||
१२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
मैत्रे मुहूर्ते सम्प्राप्ते मृद्वर्चिषि दिवाकरे ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
मैत्रेय़ं प्राह किर्मीरः कथं भीमेन पातितः ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
मैत्रेय़स्य च संवादं कृष्णद्वैपाय़नस्य च ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
मैत्रेय़ेणाभिशप्तश्च पूर्वमेव महर्षिणा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
मैत्रेय़ो धार्तराष्ट्रं तमशपद्दुष्टचेतसम् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
मैत्रोऽथ शीलसम्पन्नः सुसहाय़परश्च यः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
मैथिलो जनको नाम धर्मध्वज इति श्रुतः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०९
मृग उवाच
मैथुनं तु प्रतीक्ष्यं मे स्यात्त्वय़ेहानृशंसतः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
मैथुनं सततं गुप्तमाहारं च समाचरेत् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
मैथुनं समय़े धर्म्यं गुह्यं चैव समाचरेत् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
शिवो उवाच
मैथुनाय़ेह सम्प्राप्ता कामं प्राप्तं द्रुतं चर |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
मैथुनोपगतो यस्मात्त्वय़ाहं विनिवारितः |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
मैनाकात्परतो राजन्गोविन्दो गिरिरुत्तमः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
मैनाके पर्वते स्नात्वा तथा सन्ध्यामुपास्य च |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
मैन्दद्विविदनीलाश्च प्राय़ः प्लवगसत्तमाः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनूमांश्चानिलात्मजः |
२३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
मैरेय़ं मधु मांसानि पानकानि लघूनि च |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
मैरेय़कं च वैदेहः सम्प्रसूतेऽथ माधुकम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१३९
देवा ऊचुः
मैवं कृथा यवक्रीत यथा वदसि वै मुने |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
द्रुपद उवाच
मैवं जीर्णमुपासिष्ठाः सख्यं नवमुपाकुरु |
६ क