अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
यस्तु सञ्जनय़ित्वाग्निमादित्योदय़नं प्रति |
६६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
यस्तु सर्वमिदं हन्याद्व्राह्मणं च न तत्समम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
कन्यो उवाच
यस्तु सर्वाणि भूतानि त्वय़ा सह विजेष्यति |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
यस्तु सिंहः श्वभिः कीर्णः सिंहकर्मफले रतः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
यस्तु सूर्येण निष्टप्तं गाङ्गेय़ं पिवते जलम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
यस्तु सेनापतिं हत्वा तद्यानमधिरोहति |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
१५९
गन्धर्व उवाच
यस्तु स्यात्कामवृत्तोऽपि राजा तापत्य सङ्गरे |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१५९
गन्धर्व उवाच
यस्तु स्यात्क्षत्रिय़ः कश्चित्कामवृत्तः परन्तप |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२४
विनतो उवाच
यस्ते कण्ठमनुप्राप्तो निगीर्णं वडिशं यथा |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
यस्ते कामोऽभिलषितश्चिरात्प्रभृति हृद्गतः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
यस्ते पार्थेषु विद्वेषो या भक्तिः कौरवेषु च |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
नारद उवाच
यस्ते पुत्रो दय़ितोऽय़ं विय़ातः; स्वर्णष्ठीवी यमदात्पर्वतस्ते |
१४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
यस्ते युद्धमय़ं दर्पं कामं च व्यपनाशय़ेत् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
यस्ते शरः सर्पमुखो विभाति; सदाग्र्यमाल्यैर्महितः प्रय़त्नात् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
यस्ते शरीरे हृदय़ं दुनोति; कामः कुरूनसपत्नोऽनुशिष्याम् ||
४६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
यस्तेनाशंसते योद्धुं कर्तव्यं तस्य भेषजम् ||
११ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
कृप उवाच
यस्तेषां तदवस्थानां द्रुह्येत पुरुषोऽनृजुः |
१२ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
यस्तेषामेरकां कश्चिज्जग्राह रुषितो नृप |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
यस्त्यजेन्नैमिषे प्राणानुपवासपराय़णः |
५७ क
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
यस्त्रिभिर्नित्यसम्पन्नो रूपेणास्त्रेण मेधय़ा |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
राजो उवाच
यस्त्रिषष्टिशतारस्य वेदार्थं स परः कविः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्रीनश्वमेधानाजहार |
११ ग
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
यस्त्रय़ोदशवर्षाणि गदय़ा कृतनिश्रमः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वं त्रैविद्यवृद्धानां व्राह्मणानां सहस्रशः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०७
मुनिरु उवाच
यस्त्वं प्रव्रजितो राज्याद्व्यसनं चोत्तमं गतः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२८५
सूर्य उवाच
यस्त्वं प्राणविरोधेन कीर्तिमिच्छसि शाश्वतीम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
जरितो उवाच
यस्त्वं मां सर्वशो हीनामुत्सृज्यासि गतः पुरा |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
यस्त्वं वृद्धं सर्वराज्ञां हितवुद्धिं जितेन्द्रिय़म् |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वं वृष्णिप्रवीरस्य कुरुषे नाभिवादनम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९
भीष्म उवाच
यस्त्वं श्मशाने मृतकान्पूतिकानत्सि कुत्सितान् ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
यस्त्वं संस्तभ्य सलिलं भीतो राजन्व्यवस्थितः ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वं स्त्रीवद्युधा प्राप्तं साम्ना मां प्रत्यगृह्णथाः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वृहदश्व उवाच
यस्त्वत्तो दुःखिततरो राजासीत्पृथिवीपते ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वृहदश्व उवाच
यस्त्वत्तो दुःखिततरो राजासीत्पृथिवीपते ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
यस्त्वत्र मन्त्रसमय़ो भार्यापत्योर्मिथः कृतः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४९
नाग उवाच
यस्त्वमात्महितं त्यक्त्वा मामेवेहानुरुध्यसे ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
यस्त्वमित्रेण सन्धत्ते मित्रेण च विरुध्यते |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१४१
युधिष्ठिर उवाच
यस्त्वमुत्सहसे नेतुं भ्रातरौ सह कृष्णय़ा |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
युधिष्ठिर उवाच
यस्त्वमुत्सहसे भेत्तुं द्रोणानीकं सुदुर्भिदम् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कृप उवाच
यस्त्वमुत्सहसे योद्धुं समरे शौरिणा सह ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४१
युधिष्ठिर उवाच
यस्त्वमुत्सहसे वोढुं द्रौपदीं विपुलेऽध्वनि ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
यस्त्वमेको हि नः सर्वान्संय़ुगे योद्धुमिच्छसि ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
यस्त्वल्पेनापि कार्येण सकृदाक्षारितो भवेत् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
यस्त्ववध्यवधे दोषः स वध्यस्यावधे स्मृतः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वश्व इति विख्यातः श्रीमानासीन्महासुरः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
यस्त्वस्य विहितो घातस्तं करिष्यामि भारत |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वस्य सहसा राजन्विकारः समपद्यत |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
व्रह्मो उवाच
यस्त्वां ज्वलन्तमासाद्य स्वय़ं वै मानवः क्वचित् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वां द्रक्ष्यति दिव्येन चक्षुषा वाहिनीगतम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
यस्त्वां द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्त्वामनु स मामनु ||
३८ ख