द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
यच्च विश्वं महत्पाति महादेवस्ततः स्मृतः ||
९१ ख
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
यच्च वीरं न पश्यामि धनञ्जय़मुपान्तिके ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
यच्च वो वचनं श्रुत्वा व्रूय़ात्प्रतिवचो नरः |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
व्यास उवाच
यच्च वो हृदि सर्वेषां दुःखमेनच्चिरं स्थितम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
यच्च शंसन्ति शास्त्रेषु वदन्ति परमर्षय़ः ||
९८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
यच्च शिष्टं विराटस्य वलं तच्च समाद्रवत् ||
६१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
भीष्म उवाच
यच्च शिष्येण कर्तव्यं कार्यं दासेन वा पुनः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
यच्च साम्नैव शक्येत कार्यं साधय़ितुं नृप |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
व्रह्मो उवाच
यच्च स्वर्गसुखं देवि तत्ते सम्पत्स्यते शुभे ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
यच्च स्वय़ं नतं दारु न तत्संनामय़न्त्यपि ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
यच्च स्वय़ं नतं दारु न तत्संनामय़न्त्यपि ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
गन्धर्व उवाच
यच्चक्षुषा द्रष्टुमिच्छेत्त्रिषु लोकेषु किञ्चन |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
भीष्म उवाच
यच्चाक्षरमिति प्रोक्तं शिवं क्षेम्यमनामय़म् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
यच्चाग्नौ भवति वृथाभिहूय़माने; तत्सर्वं भवति वृथाभिधीय़माने ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
जनमेजय़ उवाच
यच्चात्र कारणं व्रह्मन्कार्यस्यास्य विनिश्चय़े ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
यच्चानुग्रहसंय़ुक्तमेतदुक्तं त्वय़ानघ ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
यच्चानृत इति ख्याय़ेद्यच्च गच्छेत्पराभवम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
यच्चान्यत्काङ्क्षसे कामं यवक्रीर्गम्यतामिति |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
यच्चान्यदपि तत्सर्वं सम्भूतं लोकसाक्षिकम् ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
यच्चान्यदपि ते नास्ति तदप्यादत्स्व भारत |
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
७३
वृहदश्व उवाच
यच्चान्यदपि पश्येथास्तच्चाख्येय़ं त्वय़ा मम ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
यच्चान्यदपि लोकेषु सत्त्वं तेजोधिकं स्मृतम् |
१६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
यच्चान्यदपि वेत्तव्यं तत्त्वतो वेद तद्भवान् ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८
शल्य उवाच
यच्चान्यदपि शक्ष्यामि तत्करिष्यामि ते प्रिय़म् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
शल्य उवाच
यच्चान्यदपि शक्ष्यामि तत्करिष्याम्यहं तव ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
यच्चान्यदेव विहितं तच्चापि भृगुनन्दन ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
यच्चापश्यं हतं भीष्मं पश्यतस्तेऽनुजस्य वै |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
यच्चापि कत्थसे राम वहुशः परिषत्सु वै |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५७
भीष्म उवाच
यच्चापि किञ्चित्कर्तव्यमन्यच्चोक्षैः सुसंस्कृतम् |
११ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
यच्चापि किञ्चित्पुरुषो दिष्टं नाम लभत्युत |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
यच्चापि तान्प्रव्रजतः कृष्णाजिननिवासिनः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
यच्चापि तीर्थानि चरन्नगच्छं द्वारकां प्रति |
६३ क
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
यच्चापि ते भय़ं तस्मान्मनसिस्थमरिन्दम |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२८४
जनमेजय़ उवाच
यच्चापि ते भय़ं तीव्रं न च कीर्तय़से क्वचित् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
अगस्त्य उवाच
यच्चापि त्वमृषीन्मूढ व्रह्मकल्पान्दुरासदान् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
यच्चापि दृष्टं विविधं पुराणं; साङ्ख्यागतं तन्निखिलं नरेन्द्र ||
१०३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८४
सरस्वत्यु उवाच
यच्चापि द्रव्यमुपय़ुज्यते ह; वानस्पत्यमाय़सं पार्थिवं वा |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
यच्चापि परमं दिव्यं तच्चाप्यवगतं त्वय़ा |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
यच्चापि पाण्डवान्विप्र स्तोतुमिच्छसि संय़ुगे |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
यच्चापि पुत्रदारं स्वं तत्संनिसृजसे मय़ि |
१६४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
यच्चापि भीमसेनस्य मन्यसे मोघगर्जितम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
वैशम्पाय़न उवाच
यच्चापि वज्रपाणेस्ते प्रिय़ं कृतमरिन्दम |
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
यच्चापि वृष्णिवीरेण कृष्णेन कुरुनन्दन |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
यच्चापि सर्वभूतानां वीजं तदहमर्जुन |
३९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
यच्चाप्यत्र भवेद्वाच्यं गर्हितं लोकनिन्दितम् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
यच्चाप्यननुरूपं ते लिङ्गस्यास्य विचेष्टितम् |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
यच्चाप्यन्यद्देशकालोपपन्नं; तद्वै वाच्यं तत्करिष्यामि कृत्स्नम् ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
यच्चाप्यन्यन्मनोज्ञं ते तदप्यादत्स्व सात्वत ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७६
अर्जुन उवाच
यच्चाप्यपश्यतोपाय़ं धर्मिष्ठं मधुसूदन |
१३ क