अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
यच्छ्रुत्वा मनुजश्रेष्ठ सर्वान्कामानवाप्स्यसि ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
यच्छ्रुत्वा मुनय़ः सर्वे विस्मय़ं परमं गताः ||
१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
यच्छ्रुत्वा विप्रमुच्यन्ते संसारेभ्यो विचक्षणाः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
अर्जुन उवाच
यच्छ्रेय़ एतय़ोरेकं तन्मे व्रूहि सुनिश्चितम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यच्छ्रेय़ः पुण्डरीकाक्ष तद्ध्याय़स्व सुरोत्तम ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
यच्छ्रेय़ः पुण्डरीकाक्ष तद्ध्याय़स्व सुरोत्तम ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
अर्जुन उवाच
यच्छ्रेय़ः स्यान्निश्चितं व्रूहि तन्मे; शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
यच्छय़ीमहि सङ्ग्रामे शरतल्पगता वय़म् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
यज देहि प्रजा रक्ष धर्मं समनुपालय़ |
५३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
यज वीजैः सहस्राक्ष त्रिवर्षपरमोषितैः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
यजतः पुत्रकामस्य कश्यपस्य प्रजापतेः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यजतः सर्पसत्रेण राज्ञः पारिक्षितस्य च |
७४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
यजतः स्वर्गविधिना प्रेत्य स्वर्गफलं महत् ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
यजतस्तत्र सत्रेण सर्वकामसमृद्धिना ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
यजतां यज्ञकामानां यज्ञैर्विपुलदक्षिणैः |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
यजतां विविधैर्यज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
यजते क्रतुमुख्येन पूर्वेषां कीर्तिवर्धनः ||
११ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
यजते नित्ययज्ञैश्च स्वाध्याय़परमः शुचिः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
यजतो दीर्घसत्रैर्मे शापाच्चोशनसो मुनेः |
३८ क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
यजध्वं च महाय़ज्ञैर्भोगानश्नीत दत्त च |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
वासुदेव उवाच
यजध्वं विपुलैर्यज्ञैर्विप्रेभ्यो दत्त दक्षिणाः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
यजनं याजनं गत्वा तथैव व्रह्मवालुकाम् |
११४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
यजनं याजनं चैव तथा दानप्रतिग्रहौ |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
यजनाध्ययने चैव यच्चान्यदपि किञ्चन ||
२५ ग
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
यजन्ति पुत्रकामाश्च पुत्रिणश्च सदा जनाः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
यजन्ति सत्रैस्त्वामेव यज्ञैश्च परमाध्वरे ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
यजन्ते क्रतुभिर्देवास्तथा चक्रचरा नृप ||
७३ ग
सभा पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
यजन्ते क्षत्रिय़ा लोकांस्तद्विद्धि मगधाधिप ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
यजन्ते च त्रय़ो वर्णा महाय़ज्ञैः पृथग्विधैः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
यजन्ते तं जनास्तत्र वीरस्थाननिषेविणम् ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
यजन्ते ते महेन्द्रेण मोदन्ते सह भारत ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
यजन्ते त्वामहरहर्नानामूर्तिसमास्थितम् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
यजन्ते नामय़ज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यजन्ते पुण्डरीकेण राजसूय़ेन चैव ये |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
यजन्ते मां तथा वैश्याः स्वर्गलोकजिगीषवः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
यजन्ते मानवाः केचित्प्रशान्ताः सर्वकर्मसु ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
यजन्ते वेदविदुषो मां देवय़जने स्थितम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
यजन्ते हि तदा राजन्व्राह्मणा वहुभिः सवैः |
९९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
यजन्तोऽहरहर्यज्ञैर्निराशीर्वन्धना वुधाः ||
१३ ग
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
यजन्तौ क्रतुभिर्नित्यं पुण्यैर्भरतसत्तम ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
यजन्त्येनं जनास्तत्र वीरस्थान इतीश्वरम् ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
यजमानस्य वै देवाञ्जमदग्नेर्महात्मनः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
यजमानांस्तु तान्दृष्ट्वा व्यग्रान्दीक्षानुकर्शितान् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
यजमानो महाय़ज्ञैर्व्राह्मणेभ्यो ददौ धनम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
यजमानो यथात्मानमृत्विजश्च तथा प्रजाः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१२७
ऋत्विगु उवाच
यजस्व जन्तुना राजंस्त्वं मय़ा वितते क्रतौ |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वासुदेव उवाच
यजस्व मदनुज्ञातः प्राप्त एव क्रतुर्मय़ा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
यजस्व वाजिमेधेन यथेन्द्रो विजय़ी पुरा ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
यजस्व वाजिमेधेन विधिवद्दक्षिणावता |
२६ क