स्त्री पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
यत्तदुच्यति कान्तारं महत्संसार एव सः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तदुद्यन्निवादित्यो ज्योतिषा प्रणुदंस्तमः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
यत्तदेकाक्षरं व्रह्म नानारूपं प्रदृश्यते |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तद्घोरं पशुपतिः प्रादादस्त्रं महन्मम |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
युधिष्ठिर उवाच
यत्तद्दर्शितवान्व्रह्मा देवं हय़शिरोधरम् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तद्द्यूतपरिक्लिष्टां कृष्णामानिन्यिरे सभाम् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
यत्तद्द्वादश वर्षाणि वने निर्व्युषिता वय़म् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
यत्तद्धय़शिरः पार्थ समुदेति वरप्रदम् |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
यत्तद्यतिवरा युक्ता ध्यानय़ोगवलान्विताः |
१९७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
शक्र उवाच
यत्तद्यानसहस्रेण ज्ञातिभिः परिवारितः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
भीष्म उवाच
यत्तद्यानसहस्रेण ज्ञातिभिः परिवारितः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
यत्तद्रहस्यं परमं व्रह्मप्रोक्तं सनातनम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
यत्तद्रौद्रमिति ख्यातं सर्वामित्रविनाशनम् ||
३८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
यत्तद्वर्षशतं पूर्णं जप्यं वै जपता त्वय़ा |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
यत्तद्वर्षसहस्रान्तं पूर्णं भवितुमर्हति |
७० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तद्वलममित्राणां तथा वीरसमुद्यतम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तद्विनिहते भीष्मे कौरवाणामपावृतम् ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
वासुदेव उवाच
यत्तद्विराटनगरे श्रूय़ते महदद्भुतम् |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
यत्तद्विराटनगरे सह भ्रातृभिरग्रतः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
यत्तद्वुद्धेः परं प्राहुः साङ्ख्या योगाश्च सर्वशः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तद्वैकर्तनं कर्णमगमद्वो मनस्तदा |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तद्व्रह्मशिरो नाम तपसा रुद्रमागतम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
४१
अर्जुन उवाच
यत्तद्व्रह्मशिरो नाम रौद्रं भीमपराक्रमम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
यत्तन्महर्षिभिर्दृष्टं वेदान्तेषु च गीय़ते |
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
यत्तन्मय़ा वाणसमर्पितेन; ध्यातोऽसि कर्णस्य वधाय़ वीर |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
यत्तपस्यसि कौन्तेय़ तत्कुरुष्व मदर्पणम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
यत्तमोपहतं चित्तमाशु सञ्चारमध्रुवम् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
यत्तस्य घटमानस्य क्षिप्रं विक्षिपतः शरान् |
५० क
विराट पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
यत्ता भवन्तस्तिष्ठन्तु स्याद्युद्धं समुपस्थितम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
यत्ता मदर्थं तिष्ठन्ति कुरुवीराभिरक्षिताः ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
यत्ता योत्स्यन्ति मा भैस्त्वं सैन्धव व्येतु ते भय़म् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
यत्ता रक्षत राधेय़ं नाहत्वा समरेऽर्जुनम् |
७३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
यत्ता रक्षन्तु गाङ्गेय़ं तस्मिन्गुप्ते ध्रुवो जय़ः ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
यत्ताः सेनामहेष्वासाः पर्यरक्षन्त सर्वशः ||
८२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
यत्ताश्चापि सुरा आसन्यत्ताश्चाद्यापि तं प्रति ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
यत्तु कर्णमहं व्रूय़ां हितकामः प्रिय़ाप्रिय़म् |
६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
गान्धार्यु उवाच
यत्तु कर्माकरोद्भीमो वासुदेवस्य पश्यतः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
यत्तु कारणमुत्पत्तेः सुवर्णस्येह कीर्तितम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तु कार्यं महावाहो मनसा कार्यतां गतम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
यत्तु कुत्सय़से योधान्युध्यमानान्यथावलम् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तु कुर्यामहं राजञ्शुभं वा यदि वाशुभम् |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् |
२२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तु ज्ञातिविमर्देऽस्मिन्नात्थ दुर्योधनं प्रति |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तु तद्भवता प्रोक्तं तदा केशव सौहृदात् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
कुशिक उवाच
यत्तु तावदतिक्रान्तं धर्मद्वारं तपोधन |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
यत्तु तीर्थं च शौचं च तन्मे शृणु समाहितः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
यत्तु दानपतिं शूरं क्षुधिताः पृथिवीचराः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
यत्तु धर्मप्रवृत्तः सन्केशग्रहणमाप्तवान् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
यत्तु धर्मप्रवृत्तस्य हृतं राज्यमधर्मतः |
९ क