शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
ये तु शक्रकथां दिव्यामिमां पर्वसु पर्वसु |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
ये तु शिष्टाः सुनिय़ताः श्रुतित्यागपराय़णाः |
६४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
ये तु शृण्वन्ति ते वाक्यं तानसूय़ामि माधव ||
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
ये तु सङ्ग्रामभूमिष्ठा याचमानाः पराङ्मुखाः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
ये तु सर्वाणि कर्माणि मय़ि संन्यस्य मत्पराः |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
ये ते कीचकवेणूनां छाय़ां रम्यामुपासते ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
ये ते तपसि वर्तन्ते वने मूलफलाशनाः |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
ये ते तेजस्विनो दान्ता वलवन्तोऽभिमानिनः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
ये ते द्वादश वर्षाणि क्रीडामुत्सृज्य वालकाः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
ये ते नित्यमसन्त्याज्या यथा प्राहुर्मनीषिणः ||
२४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
ये ते पुत्रांश्च दाराश्च प्राणांश्च मनसः प्रिय़ान् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
ये ते पूर्वं शक्ररूपा निरुद्धा; स्तस्यां दर्यां पर्वतस्योत्तरस्य |
३२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
नारद उवाच
ये ते भागीरथीतीरे मय़ा दृष्टा युधिष्ठिर ||
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
ये ते मधुकरास्तत्र कामास्ते परिकीर्तिताः ||
१० ग
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
ये ते मन्दा मृत्युवशाभिपन्नाः; समानीता धार्तराष्ट्रेण मूढाः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
ये ते यय़ातिपतने यज्ञे सन्तः समागताः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
ये ते रात्र्यहनी पूर्वे कीर्तिते दैवलौकिके |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
ये ते वाल्यात्प्रभृत्येव गुरुशुश्रूषणे रताः |
५ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ये ते वीरा महात्मानो भ्रातरो मे महाव्रताः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
ये ते वेदाः शरीरस्था व्राह्मण्यं यच्च ते महत् |
२४ क
मौसल पर्व
अध्याय
९
अर्जुन उवाच
ये ते शूरा महात्मानः सिंहदर्पा महावलाः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
ये ते स्त्रिय़ौ धाता विधाता च |
१७२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
ये तेरुरुच्चावचशस्त्रनौभि; स्ते राजपुत्रा निहताः प्रमादात् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
ये त्यजन्त्यसमर्थांस्तांस्ते वै निरय़गामिनः ||
७६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
ये त्वजाग्रत कौरव्य तेऽपि शव्देन मोहिताः |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
ये त्वतस्तान्प्रवक्ष्यामि परीक्षस्वेह तान्द्विजान् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
ये त्वदीय़ा महेष्वासा राजानो भरतर्षभ |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
ये त्वद्य समरं कृष्ण न हास्यन्ति रणोत्कटाः |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
ये त्वन्यथैव पश्यन्ति न सम्यक्तेषु दर्शनम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
ये त्वन्ये तत्त्वकुशलास्तेषामेतन्निदर्शनम् |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
ये त्वन्ये पृथिवीपालाः समेताः सर्वतो दिशः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
ये त्वन्ये व्रह्मसदने सिद्धसङ्घाः समागताः |
१०६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
ये त्वन्ये शुद्धमनसो दय़ाधर्मपराय़णाः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
भीष्म उवाच
ये त्वव्यक्तात्परं नित्यं जानते शास्त्रतत्पराः |
१०४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
ये त्वसक्ता महात्मानस्ते यान्ति परमां गतिम् ||
१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
ये त्वहृष्टेन मनसा मर्तव्यमिति भारत |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ये त्वा रणे गतं वीरं न जानन्ति निपातितम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
राजो उवाच
ये त्वा विदुर्व्राह्मणं वामदेव; वाचा हन्तुं मनसा कर्मणा वा |
६५ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
ये त्वां दासमराजानं वाल्यादर्चन्ति दुर्मतिम् |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
ये त्वां न वारय़न्त्याशु प्रपतन्तं हुताशने ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
ये त्वां प्रोत्साहय़न्त्येते नैते कृत्याय़ कर्हिचित् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
राजो उवाच
ये त्वां व्राह्मण नेच्छन्ति न ते वत्स्यन्ति मे गृहे |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
ये त्वादानपरा एव वसन्ति भवतो गृहे |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
मातो उवाच
ये त्वादृतात्मनां लोकाः सुहृदस्तान्व्रजन्तु नः ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय
६
विराट उवाच
ये त्वानुवादेय़ुरवृत्तिकर्शिता; व्रूय़ाश्च तेषां वचनेन मे सदा |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
ये त्विमे क्षुरसङ्काशाः सहस्रा लोमवाहिनः |
४७ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
ये त्विमे निशिताः पीताः पृथवो दीर्घवाससः |
५३ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
ये त्विमे भास्कराकाराः सर्वपारशवाः शराः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
ये त्वेकरतय़ो नित्यं धीरा नाप्रिय़वादिनः |
३ क