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द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
यतो द्रोणस्ततः सर्वे सहसा समुपाद्रवन् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
यतो धर्मस्ततः कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जय़ः |
५५ क
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
यतो धर्मस्ततः कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जय़ः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
यतो धर्मस्ततः सत्यं सर्वं सत्येन वर्धते |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
यतो धर्मस्ततो वा स्यान्मध्यस्थो वा ततो भवेत् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
यतो न गुरुरप्येनं च्यावय़ेदुपपादय़न् |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
धृतराष्ट्र उवाच
यतो नारोचय़महं विग्रहं तैर्महात्मभिः |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
वासुदेव उवाच
यतो नावसृजच्छक्तिं पाण्डवे श्वेतवाहने ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
यतो निःसरते लोको भवति व्यक्तसञ्ज्ञकः |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
यतो भीमो महेष्वासो युय़ुधे तव सैनिकैः ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
यतो भीष्मरथो राजन्दुष्प्रेक्ष्यो रश्मिमानिव ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
यतो भीष्मस्ततो द्रोणो यद्भीष्मस्त्वाह तत्कुरु ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
यतो भीष्मस्ततो राजन्दुष्प्रेक्ष्यो रश्मिवानिव ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय १३१
श्येन उवाच
यतो भूय़ांस्ततो राजन्कुरु धर्मविनिश्चय़म् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
यतो मेघाः प्रवर्तन्ते प्रभवन्ति च सर्वशः ||
१४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
जाजलिरु उवाच
यतो यज्ञः प्रभवति नास्तिक्यमपि जल्पसि |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
यतो यतः पाण्डवेय़ः प्रवृत्तो रथसत्तमः |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
यतो यतः प्रेक्षते स्म गदामुद्यम्य पाण्डवः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
यतो यतः सा सुदती मामुपाधावदन्तिके |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
हंस उवाच
यतो यतो निवर्तते ततस्ततो विमुच्यते |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् |
२६ क
स्त्री पर्व
अध्याय ३
विदुर उवाच
यतो यतो मनो दुःखात्सुखाद्वापि प्रमुच्यते |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
यतो रुद्रस्ततः स्कन्दो जगामाद्भुतदर्शनः ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
यतो लोकाः सम्भवन्ति न भवन्ति यतः पुनः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
यतो वर्षं प्रभवति वर्षाकाले जनेश्वर ||
१५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
यतो वाय़ुर्यतः सूर्यो यतः शुक्रस्ततो जय़ः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५०
नाग उवाच
यतो वाय़ुर्विनिःसृत्य सूर्यरश्म्याश्रितो महान् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५०
नाग उवाच
यतो वीजं मही चेय़ं धार्यते सचराचरम् ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय ६५
धृतराष्ट्र उवाच
यतो वुद्धिस्ततः शान्तिः प्रशमं गच्छ भारत |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
व्रह्मो उवाच
यतो वो भय़मुत्पन्नं ये चान्ये सुरशत्रवः ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
यतो हि निम्नं भवति नय़न्तीह ततो जलम् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०६
सुपर्ण उवाच
यतोमूला सुराणां श्रीर्यत्र शक्रोऽभ्यषिच्यत |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
यतोमूलानि दुःखानि सम्भवन्ति मुहुर्मुहुः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
यतोऽहं प्रसृतः पूर्वमव्यक्तात्त्रिगुणो महान् |
६७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
यत्करिष्यसि कल्याणं तत्त्वा लोकेषु धास्यति ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
यत्करोति शुभं कर्म तथाधर्मं सुदारुणम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
यत्करोत्यनभिसन्धिपूर्वकं; तच्च निर्णुदति यत्पुरा कृतम् |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४१
व्यास उवाच
यत्करोत्यनभिसन्धिपूर्वकं; तच्च निर्णुदति यत्पुरा कृतम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
यत्करोत्यशुभं कर्म शुभं वा द्विजसत्तम |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
धृतराष्ट्र उवाच
यत्कर्णं योधय़ामास समरे लघुविक्रमम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
यत्कर्णभीमप्रभवैर्वध्यते नो वलं शरैः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
यत्कर्णशल्यप्रमुखैः पार्थिवैर्लोकविश्रुतैः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
कर्ण उवाच
यत्कर्तव्यं मनुष्येण व्यवसाय़वता सता |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
यत्कर्तव्यं मय़ा देव तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
यत्कर्म कलुषं कृत्वा श्लाघसे जनसंसदि ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्कर्म वै निग्रहे शात्रवाणां; योगश्चाग्र्यः पालने मानवानाम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९५
वामदेव उवाच
यत्कल्याणमभिध्याय़ेत्तत्रात्मानं निय़ोजय़ेत् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
यत्कल्याणमभिध्याय़ेत्तत्रात्मानं निय़ोजय़ेत् ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
यत्काङ्क्षितं हृदिस्थं ते तत्सर्वं सम्भविष्यति ||
५७ ख