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सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य द्रोणो महेष्वासो न प्रादादाहवे मुखम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य धर्मो हि धर्मार्थं क्लेशभाङ्न स पण्डितः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २५४
द्रौपद्यु उवाच
यस्य ध्वजाग्रे नदतो मृदङ्गौ; नन्दोपनन्दौ मधुरौ युक्तरूपौ |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
वासुदेव उवाच
यस्य न स्युर्न वै स स्याद्यस्य स्युः कृच्छ्रमेव तत् |
९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
युधिष्ठिर उवाच
यस्य नागसहस्रेण दशसङ्ख्येन वै वलम् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २९७
यक्ष उवाच
यस्य नागसहस्रेण दशसङ्ख्येन वै वलम् |
६८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य नागाय़ुतं वीर्यं भुजय़ोः सारमर्पितम् |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय ५०
अर्जुन उवाच
यस्य नागो ध्वजाग्रे वै हेमकेतनसंश्रितः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
यस्य नाथो हृषीकेशः सदा धर्मय़शोनिधिः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
यस्य नान्यः प्रवक्तास्ति मोक्षे तमपि मे शृणु ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य नाम्ना समुद्रश्च सागरत्वमुपागतः ||
१२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
यस्य नार्तो जनपदः संनिकर्षगतः सदा |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य नाविदितं किञ्चिज्ज्ञानज्ञेय़ेषु विद्यते ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य नासीद्भय़ं पार्थैः सपुत्रैः सजनार्दनैः |
८१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
यस्य नास्ति गुरुर्धर्मे न चान्याननुपृच्छति |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य नास्ति वले तुल्यः पृथिव्यामपि कश्चन |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
यस्य नास्ति समं चक्षुः किं तस्मिन्मुक्तलक्षणम् ||
१३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य नास्ति समः कश्चित्स मां पृच्छतु पाण्डवः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
यस्य नास्ति समो योधः कौरवेषु कथञ्चन |
२१ क
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
यस्य नास्ति समो लोके शौर्ये वीर्ये च कश्चन |
१४ क
स्त्री पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य नास्ति समो वीर्ये पृथिव्यामपि कश्चन |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
यस्य नाहङ्कृतो भावो वुद्धिर्यस्य न लिप्यते |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य नित्यमृता वाचः स्वैरेष्वपि महात्मनः |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
यस्य निर्दहतः सेनां गतिरग्नेरिवाभवत् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
यस्य नोत्क्रामति मतिः स्वर्गमार्गानुसारिणी |
८० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
यस्य नोपहता वुद्धिर्निश्चय़ेष्ववलम्वते |
८१ क
आदि पर्व
अध्याय ११८
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य पञ्च सुता वीरा जाताः सुरसुतोपमाः ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
यस्य पुत्रशतं श्रीमदभवद्वाहुशालिनः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
उशनो उवाच
यस्य पृथ्वीतलं तात साकाशं वाहुगोचरम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य प्रभावान्न मय़ा सभामध्ये धनुष्मतः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
भीष्म उवाच
यस्य प्रसादं कुरुते स वै तं द्रष्टुमर्हति ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
यस्य प्रसादं कुर्वाते स देवौ द्रष्टुमर्हति ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
यस्य प्रसादजो व्रह्मा रुद्रश्च क्रोधसम्भवः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य प्रसादात्कर्माणि कुर्वन्ति पुरुषर्षभाः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य प्रसादात्कौन्तेय़ा राजपुत्रा महावलाः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
यस्य प्रसादात्तद्भक्तो मर्त्यो गच्छत्यमर्त्यताम् |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
यस्य प्रसादाद्दिव्यं मे प्राप्तं ज्ञानमनुत्तमम् ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
यस्य प्रसादाद्दुर्नीतं प्राप्तास्मि भरतर्षभ ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य प्रसादाद्वक्ष्यामि नाराय़णकथामिमाम् ||
१९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
यस्य प्रसादाद्वीभत्सुः पाण्डवः कर्म दुष्करम् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
यस्य प्रागेव विदिता सर्वार्थानामनित्यता |
२६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
यस्य भागश्चतुर्थो मे स्वप्नमह्नाय़ नाशय़ेत् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य भार्यासहस्राणां शतमासीन्महात्मनः ||
९८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
यस्य भाषितमात्रेण प्रसादमुपगच्छथ ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य भीतो वने नित्यं धर्मराजो युधिष्ठिरः |
७७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
यस्य भीमार्जुनौ योधौ स राजा राजसत्तम ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
यस्य भूतैः सह मुने स श्रेय़ो विन्दते परम् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
यस्य भूमिस्तस्य सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
यस्य भृत्यजनः सर्वो ज्ञानविज्ञानकोविदः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
यस्य मन्त्रं न जानन्ति वाह्याश्चाभ्यन्तराश्च ये |
१५ क