chevron_left  यावदूर्ध्वमधश्चैवarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ११३
भीष्म उवाच
यावदूर्ध्वमधश्चैव ग्रीवां सङ्क्षिपते पशुः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
यावदेतत्प्रलिप्तं ते गात्रेषु मधुसूदन |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
यावदेतान्निहन्म्याशु य इमे मद्वधोद्यताः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
यावदेतान्पुनः सुभ्रु क्षिपामीति जनाधिप ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
यावदेते प्रपश्यन्ति पङ्क्त्यास्तावत्पुनन्त्युत |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
यावदेनं निहन्म्यद्य तच्छ्रुत्वा व्यथिता नदी ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
यावदेनं निहन्म्यद्य भुजङ्गमिव पक्षिराट् ||
३६ ख
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
यावदेव न सम्वुद्धं तावदेव भवेत्तव |
२० क
वन पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
यावदेव परिद्यूना यावच्छोकपराय़णाः |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय ५१
दुर्योधन उवाच
यावदेव भवेत्कल्पस्तावच्छ्रेय़ः समाचरेत् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
द्रोण उवाच
यावदेव भय़ं पश्चात्तावदेषां पुरःसरम् ||
११ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
यावदेव मनुष्याणामन्ने भावो भविष्यति |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
यावदेव स राजा वै नोपय़ाति पुरं मम |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४२
व्राह्मण उवाच
यावदेवानतीतं मे वय़ः पुत्रफलाश्रितम् |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
यावद्गाण्डीवनिर्घोषं न शृणोषि महाहवे |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७३
व्रह्मो उवाच
यावद्दाने फलं तस्यास्तावन्निरय़मृच्छति ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
यावद्द्रव्यगुणस्तावत्प्रदीपः सम्प्रकाशते |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
यावद्धनं प्रार्थय़ते व्राह्मणोऽय़ं सखा तव |
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ३९
तक्षक उवाच
यावद्धनं प्रार्थय़से तस्माद्राज्ञस्ततोऽधिकम् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
यावद्धनं प्रार्थय़से तस्माद्राज्ञस्ततोऽधिकम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय २८१
सत्यवानु उवाच
यावद्धरिष्यसे पुत्र तावन्नौ जीवितं ध्रुवम् ||
८६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
यावद्धि कुरुमुख्यस्य जीवत्पुत्रस्य वै सुखम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वासुदेव उवाच
यावद्धि पृथिवीपाल पृथिवी स्थास्यते ध्रुवा |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वासुदेव उवाच
यावद्धि प्रथते लोके पुरुषस्य यशो भुवि |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
यावद्धि प्रलय़स्तात सूक्ष्मेणाष्टगुणेन वै |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
यावद्धि सूच्यास्तीक्ष्णाय़ा विध्येदग्रेण माधव |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
यावद्धि सूच्यास्तीक्ष्णाय़ा विध्येदग्रेण मारिष |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
यावद्धौम्यो न सेनाग्नौ जुहोतीह द्विषद्वलम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
यावद्ध्यपङ्क्त्यः पङ्क्त्यां वै भुञ्जानाननुपश्यति |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
यावद्भीमो महावाहुर्विगाह्य महतीं चमूम् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
यावद्भूमेराय़ुरिह तावद्भूमिद एधते |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
धृतराष्ट्र उवाच
यावद्भूम्यवकाशोऽय़ं दृश्यते शशलक्षणे |
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
यावद्यावदभूच्छ्रद्धा देहं धारय़ितुं नृणाम् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
यावद्युगानां विप्रर्षे सहस्रपरिवर्तनम् |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
यावद्रथपथस्तावद्रथेन स तु गच्छति |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
यावद्राज्ञोऽस्य नीलस्य कुलवंशधरा इति |
३४ ख
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
यावद्रामकथा वीर भवेल्लोकेषु शत्रुहन् |
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
यावद्वर्षसहस्रं तु जम्वूद्वीपे प्रवर्षति |
१२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
यावद्वलं मे पुत्रेषु पश्यस्येतज्जनार्दन |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
यावद्वाणैर्विनिर्भिन्नः पुनर्नैवं वदिष्यसि ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २२
स्त्र्यु उवाच
यावद्व्रवीमि विप्रर्षे अष्टावक्र यथातथम् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
यावनाथौ चरिष्येते त्वय़ा नाथेन दुर्हृदा |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३४
व्राह्मण उवाच
यावन्त इह शक्येरंस्तावतोंऽशान्प्रकल्पय़ेत् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
यावन्तः पतिता विप्रा जडोन्मत्तास्तथैव च |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
यावन्तः पावकाः प्रोक्ताः सोमास्तावन्त एव च ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
यावन्ति तस्य प्रोक्तानि दिवसानि शतक्रतो |
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७३
व्रह्मो उवाच
यावन्ति तस्या लोमानि तावद्वर्षाणि मज्जति ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
यावन्ति रोमकूपाणि तस्य गात्रेषु पाण्डव |
६१ क
वन पर्व
अध्याय १८४
सरस्वत्यु उवाच
यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या; स्तावद्वर्षाण्यश्नुते स्वर्गलोकम् ||
९ ख