शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
योऽद्भिः संय़ोज्य जीमूतान्पर्जन्याय़ प्रय़च्छति |
४० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
योऽद्य त्वमस्मान्राजेन्द्र श्रेय़सा योजय़िष्यसि ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
योऽद्यानाथ इवाक्रम्य पार्षतेन हतस्तथा |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
योऽद्राक्षीत्पाण्डवश्रेष्ठं वहुसङ्ग्रामकर्शितम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
योऽधीत्य चतुरो वेदान्सर्वानाख्यानपञ्चमान् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
योऽध्यापय़ेदधीय़ीत यजेद्वा याजय़ीत वा |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय
२०
जरासन्ध उवाच
योऽनागसि प्रसृजति क्षत्रिय़ोऽपि न संशय़ः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
योऽनाहिताग्निः शतगुरय़ज्वा च सहस्रगुः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
योऽनुपश्यति स प्रेत्य कल्पते व्रह्मभूय़से ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
योऽनुमन्येत हन्तव्यं सोऽपि दोषेण लिप्यते ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३९
शिशुपाल उवाच
योऽनेन युद्धं नेय़ेष दासोऽय़मिति संय़ुगे ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
योऽन्यस्य स्यादुपपतिः स कं किं वक्तुमर्हति |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
योऽन्योऽस्ति मत्तोऽभ्यधिको विप्रा यस्याधिकं प्रिय़ाः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
योऽन्वकम्पत वै नित्यं प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
योऽन्वास्यत पुरा वीरो वरस्त्रीभिर्महाभुजः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
५३
शकुनिरु उवाच
योऽन्वेति सङ्ख्यां निकृतौ विधिज्ञ; श्चेष्टास्वखिन्नः कितवोऽक्षजासु |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
योऽन्वय़ो मातृकस्तस्य स एनमभिपेदिवान् ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
योऽपकर्तॄंश्च कर्तॄंश्च तेजसैवोपगच्छति |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
योऽपाश्रय़ः पाण्डवानां देवानामिव वासवः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
योऽपि मे निर्जनेऽरण्ये सम्प्राप्तोऽय़ं जनार्णवः |
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
योऽपि स्यात्पीठगः कश्चित्किं पुनः समरे स्थितः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
योऽप्यत्र परमो धर्मः पवित्रं राजराज्ययोः |
१६० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
योऽभवन्नग्रतः क्रुद्धा राक्षसस्य पुरःसराः ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
योऽभिध्याय़न्नुत्पतिष्णून्निहन्या; दनादरेणाप्रतिवुध्यमानः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
योऽभ्यर्थितः सद्भिरसज्जमानः; करोत्यर्थं शक्तिमहापय़ित्वा |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१५०
कुन्त्यु उवाच
योऽभ्युदीय़ाद्युधि श्रेष्ठमपि वज्रधरं स्वय़म् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
योऽभय़ः सर्वभूतानां स प्राप्नोत्यभय़ं पदम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
योऽमित्रैः सह सम्वद्धो न पौरान्वहु मन्यते |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
गन्धर्व उवाच
योऽरिं संय़ोजय़ेत्प्राणैः कल्याणं किं न सोऽर्हति ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
योऽरिणा सह सन्धाय़ सुखं स्वपिति विश्वसन् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
योऽरुन्धतीं न पश्येत दृष्टपूर्वां कदाचन |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
योऽर्जुनं समरे प्राप्य स्वस्तिमानाव्रजेद्गृहान् ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
योऽर्जुनं समरे शूरं प्रत्युद्याय़ात्कथञ्चन ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
योऽर्जुनस्यास्त्रमस्त्रेण प्रतिहन्यान्महाहवे ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
योऽर्जुनेनार्जुनस्तुल्यो द्विवाहुर्वहुवाहुना |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
योऽर्जुनेनार्जुनस्तुल्यो द्विवाहुर्वहुवाहुना |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
योऽर्थकामस्य वचनं प्रातिकूल्यान्न मृष्यते |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
योऽर्थकामस्य वचनं प्रातिकूल्यान्न मृष्यते |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
योऽर्थो धर्मेण संय़ुक्तो धर्मो यश्चार्थसंय़ुतः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
योऽवधीत्केतुमाञ्शूरो राजपुत्रं सुदर्शनम् |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
योऽवधीद्भुजवीर्येण दिष्ट्या पार्थः स जीवति ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
योऽश्वः सोऽग्निः ||
१७३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
योऽश्वमेधसहस्रेण तर्पय़ामास देवताः ||
१२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५०
नाग उवाच
योऽष्टमासांस्तु शुचिना किरणेनोज्झितं पय़ः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
योऽष्टाविंशे तु दिवसे प्राश्नीय़ादेकभोजनम् |
१११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
योऽसंविभज्य भृत्येभ्यः को नृशंसतरस्ततः ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
योऽसत्सेवी वृथाचारो न श्रोता सुहृदां सदा |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
योऽसावत्यन्तमस्मासु कुर्वाणः सौहृदं परम् |
३६ क