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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
यो मे वने वसतोऽभूद्द्वितीय़; स्तमेव मे देहि सुरेन्द्र नागम् ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
यो मे वितरसि प्राणानधिष्ठानं च पार्थिव ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
अश्वत्थामो उवाच
यो मे व्यावर्तय़ेदेतां वधे तेषां कृतां मतिम् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
यो मे हिंसितवांस्तातं तक्षकः स दुरात्मवान् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
यो मेऽद्य परमः कामस्तं शृणुध्वं समाहिताः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
यो मोचय़ेन्मृत्युपाशात्प्राप्नुय़ाद्धर्ममुत्तमम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
यो मोहान्न निगृह्णाति तमापद्ग्रसते नरम् ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यो मोहय़ति भूतानि स्नेहरागानुवन्धनैः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
यो मय़ार्थी स मृतकैर्मण्डूकैरुपाय़नैर्मामुपतिष्ठेदिति ||
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
यो यं कामं कामय़ते स तमाप्नोति च ध्रुवम् ||
१०६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
यो यः स्म प्राहरत्पूर्वं तं तं विव्याध पत्रिभिः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
यो यः स्म लीय़ते द्रोणं तं तं द्रोणोऽन्तकोपमः |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
यो यः स्म समरे पार्थं प्रतिसंरभते नरः |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
यो यजेताश्वमेधेन मासि मासि यतव्रतः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ७४
शुक्र उवाच
यो यजेदपरिश्रान्तो मासि मासि शतं समाः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
यो यजेदश्वमेधेन दद्याद्वा साधवे महीम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
यो यथा निर्मितो जन्तुर्यस्मिन्यस्मिंश्च कर्मणि |
६८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
यो यथा वर्तते यस्मिंस्तथा तस्मिन्प्रवर्तय़न् |
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
कपिल उवाच
यो यथाप्रकृतिर्जन्तुः प्रकृतेः स्याद्वशानुगः |
५१ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
यो यथाप्रकृतिर्जन्तुः स्वां स्वां प्रकृतिमश्नुते |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
यो यथावद्विजानाति स वितृष्णो विमुच्यते ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
यो यदाहारजातश्च स तथैव भविष्यति |
२२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यो यदिच्छति यावच्च तावत्स लभते द्विजः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
यो यमिच्छेद्यथा कामं तं तं कामं समश्नुय़ात् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
यो यमिच्छेद्यथाकामं कामानां तत्तदाप्नुय़ात् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
सत्यवानु उवाच
यो यस्तेषामपचरेत्तमाचक्षीत वै द्विजः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
यो यस्मिञ्जीवति स्वार्थं पश्येत्तावत्स जीवति |
१३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
यो यस्मिन्कुरुते कर्म यादृशं येन यत्र च |
८ क
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
यो यानैरद्भुताकारैर्हय़ैर्नागैश्च संवृतः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
यो यो भीष्मं नरव्याघ्रमभ्येति युधि कश्चन |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
यो यो यत्र द्विजो भोक्तुं कामं कामय़ते तदा |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धय़ार्चितुमिच्छति |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
यो यो याचेत यत्किञ्चित्सर्वं दद्याम इत्युत ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
यो यो हि यतते भेत्तुं द्रोणानीकं तवाहितः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
यो यो हि समरे पार्थं पत्युद्याति विशां पते |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
यो रथानां सहस्राणि दंशितानां दशैव हि |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
यो राजकोशं नश्यन्तमाचक्षीत युधिष्ठिर ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
वाय़ुरु उवाच
यो राजानं नय़ेद्वुद्ध्या सर्वतः परिपूर्णय़ा ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
द्युमत्सेन उवाच
यो राज्ञो दम्भमोहेन किञ्चित्कुर्यादसाम्प्रतम् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
यो राष्ट्रमनुगृह्णाति परिगृह्य स्वय़ं नृपः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
यो रुक्मिणीमेकरथेन भोज्या; मुत्साद्य राज्ञां विषय़ं प्रसह्य |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
यो लुव्धः सुभृशं प्रिय़ानृतश्च मनुष्यः; सततनिकृतिवञ्चनारतिः स्यात् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ३७
श्रीभगवानु उवाच
यो लोकत्रय़माविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वरः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
यो लोभमास्थाय़ास्माकं विषमं कर्तुमुत्सहेत् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
यो वत्स्यति द्रक्ष्यति वापि मर्त्य; स्तस्मै प्रय़च्छन्ति सुखानि देवाः |
८४ क
वन पर्व
अध्याय १९७
स्त्र्यु उवाच
यो वदेदिह सत्यानि गुरुं सन्तोषय़ेत च |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
यो वद्ध्वा त्रिंशतो ह्यश्वान्देवेभ्यो यमुनामनु |
४१ क
सभा पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
यो वलादनुशास्तीह सोऽमित्रं तेन विन्दति |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
यो वा न लभते कृत्वा दुर्दशौ तावुभावपि ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
यो वा निपतितं हन्ति तवास्मीति च वादिनम् ||
१३ ख