chevron_left  यजस्वarrow_drop_down
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७०
व्यास उवाच
यजस्व वाजिमेधेन विधिवद्दक्षिणावता ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
यजस्व वाजिमेधेन विधिवद्दक्षिणावता |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १३
वासुदेव उवाच
यजस्व वाजिमेधेन विधिवद्दक्षिणावता |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
यजस्व विविधैर्यज्ञैर्जुह्वन्नग्नीन्प्रय़च्छ च |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
यजस्व विविधैर्यज्ञैर्वहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
यजस्व विविधैर्यज्ञैर्वह्वन्नैः स्वाप्तदक्षिणैः |
६ क
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
यजस्वाभीप्सितं यज्ञं मय़ि श्रेय़स्यवस्थिते |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
नारद उवाच
यजाम्यहं पितॄन्साधो नाराय़णविधौ कृते |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
यजिष्णुः पञ्चमीं षष्ठीं क्षपेद्यो भोजय़ेद्द्विजान् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
यजुःपादभुजो गुह्यः प्रकाशो जङ्गमस्तथा |
८९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
यजुर्भिर्यं त्रिधा वेद्यं जुह्वत्यध्वर्यवोऽध्वरे ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
यजुषा संस्कृतं मांसं निवृत्तो मांसभक्षणात् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
यजुषा संस्कृतं मांसमुपभुञ्जन्न दुष्यति |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
यजुषामृचां च साम्नां च गद्यानां चैव सर्वशः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
यजूंषि नोपय़ुक्तानि क्षिप्रमिच्छामि वेदितुम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
यजेच्च विद्वान्विधिवत्त्रिवर्गं चाप्यनुव्रजेत् ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९९
भीष्म उवाच
यजेच्च विविधैर्यज्ञैः सत्यं च सततं वदेत् ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
यजेत तेन द्रव्येण न वृथा साधय़ेद्धनम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ||
८५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
देवा ऊचुः
यजेमहि महाभाग यज्ञं भवदनुज्ञय़ा |
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
यज्जनाः कथय़िष्यन्ति यावत्स्थास्यति मेदिनी ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
यज्ज्ञात्वा नेह भूय़ोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
यज्ज्ञात्वा पुरुषो लोके प्रीतिं सौख्यं च विन्दति |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
यज्ज्ञात्वा मुनय़ः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
यज्ज्ञात्वा सिद्धमात्मानं लोके पश्यन्ति योगिनः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः |
६१ क
सभा पर्व
अध्याय ४३
दुर्योधन उवाच
यज्ञं च तादृशं दृष्ट्वा मादृशः को न सञ्ज्वरेत् ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
यज्ञं त्वहमिमं श्रुत्वा कुरुराजस्य धीमतः |
८७ क
वन पर्व
अध्याय १३३
अष्टावक्र उवाच
यज्ञं द्रष्टुं प्राप्तवन्तौ स्व तात; कौतूहलं नौ वलवद्वै विवृद्धम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
वसिष्ठ उवाच
यज्ञं पशुपतेः प्रीता वरुणस्य महात्मनः |
८ क
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
यज्ञं भरतसिंहस्य पार्थस्यामिततेजसः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७९
वसिष्ठ उवाच
यज्ञं वहन्ति सम्भूय़ किमस्त्यभ्यधिकं ततः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
यज्ञं वहन्ति सम्भूय़ सहर्त्विग्भिः सदक्षिणैः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
यज्ञं वहुसुवर्णं वा वासवप्रिय़माहरेत् ||
१० ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
यज्ञं वेदप्रमाणेन विधिवद्यष्टुमीप्सवः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ५०
आस्तीक उवाच
यज्ञः श्रुतो नो दिवि देवसूनो; र्युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञः |
६ क
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
यज्ञः समाप्यतां तात सगरस्य महात्मनः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
यज्ञकारो गमिष्यामि रुचिं चेमां सुरेश्वरः |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञकालस्तव विभो क्रिय़तामत्र साम्प्रतम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
यज्ञक्रिय़ाश्च विविधा भविष्यन्ति कृते युगे ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
यज्ञक्षोभकरः क्रूरस्त्वय़ैव विनिपातितः ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०६
मुनिरु उवाच
यज्ञदानप्रशंसास्मै व्राह्मणेष्वनुवर्ण्यताम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
यज्ञदानानि च तथा व्रूहि सर्वं ददामि ते ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
जनमेजय़ उवाच
यज्ञधारी च सततं वेदवेदाङ्गवित्तथा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६४
भीष्म उवाच
यज्ञपत्नीत्वमानीता सत्येनानुविधीय़ते |
६ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
यज्ञप्रतिनिधिः पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा |
२५ क
वन पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञभूमिश्च देवानां शामित्रं च विवस्वतः ||
५ ख