कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
यश्चाजैषीदतिवलानमित्रानपि दुर्जय़ान् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
यश्चात्मनि प्रार्थय़ते न किं चि; द्यश्च स्वभावोपहतान्तरात्मा |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
यश्चात्मविक्रय़ं कृत्वा गाः क्रीत्वा सम्प्रय़च्छति |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
यश्चात्र धर्मनीत्युक्तो दण्डनीतिव्यपाश्रय़ः |
११३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
यश्चाधनः कामय़ते यश्च कुप्यत्यनीश्वरः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
यश्चाधर्मं चरेन्मोहात्कामलोभावनु प्लवन् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
यश्चाधर्मेण विव्रूय़ाद्यश्चाधर्मेण पृच्छति |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
यश्चाधर्मेण विव्रूय़ाद्यश्चाधर्मेण पृच्छति ||
९४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
यश्चानध्याय़कालेऽपि मोहादभ्यस्यति द्विजः |
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
यश्चापि धार्तराष्ट्रस्य हेतुः स्याद्विग्रहं प्रति |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
यश्चाप्यल्पेन सन्तुष्टो लोकेऽस्मिन्मुक्त एव सः ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
यश्चाभिजातः प्रकरोत्यकार्यं; यश्चावलो वलिना नित्यवैरी |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
यश्चाभ्यसूय़ते देवं भूतात्मानं पिनाकिनम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
यश्चामात्यं मानय़ित्वा यथार्हं; मन्त्रे च युद्धे च नृपो निय़ुञ्ज्यात् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
यश्चाशिष्यं शासति यश्च कुप्यते; यश्चातिवेलं भजते द्विषन्तम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
यश्चासतः सान्त्वमुपासतीह; एतेऽनुय़ान्त्यनिलं पाशहस्ताः ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
अर्जुन उवाच
यश्चासीदश्ववन्धस्ते नकुलोऽय़ं परन्तपः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
यश्चास्य कुरुते वृत्तिं सर्वे ते पितरस्त्रय़ः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७१
और्व उवाच
यश्चाय़ं मन्युजो मेऽग्निर्लोकानादातुमिच्छति |
१५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
यश्चाय़ं मित्रपक्षो मे मय़ि जीवति निर्जितः |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय
५६
विदुर उवाच
यश्चित्तमन्वेति परस्य राज; न्वीरः कविः स्वामतिपत्य दृष्टिम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
यश्चिनोति शुभान्येव स भद्राणीह पश्यति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यश्चिनोति सतां सेतुमृतेनामृतय़ोनिना |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
यश्चेदं पठते नित्यं यश्चेदं शृणुय़ान्नरः |
११६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
यश्चेदं पाण्डवाख्यानं पठेत्पर्वणि पर्वणि |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
यश्चेदं शृणुय़ान्नित्यं तीर्थपुण्यं सदा शुचिः |
८७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
यश्चेदं शृणुय़ान्नित्यं यश्चेदं परिकीर्तय़ेत् |
१०२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
यश्चेदं शृणुय़ान्नित्यं यश्चेदं परिकीर्तय़ेत् |
१७ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
यश्चेदं श्रावय़ेच्छ्राद्धे व्राह्मणान्पादमन्ततः |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
यश्चेदं श्रावय़ेच्छ्राद्धे व्राह्मणान्पादमन्ततः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
यश्चेमं शृणुय़ान्नित्यमार्षं श्रद्धासमन्वितः |
२०७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
यश्चेमां वसुधां कृत्स्नां प्रशासेदखिलां नृपः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
यश्चेहोपस्पृशेत्कूपे स सोमपगतिं लभेत् ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
यश्चैकं वर्जय़ेन्मांसं सममेतन्मतं मम ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
यश्चैतेन प्रमाणेन योक्ष्यत्यात्मानमात्मना |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
यश्चैनं परमं धर्मं सर्वभूतसुखावहम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
यश्चैनं शङ्कते कृत्वा नास्तिक्यात्पापचेतनः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
यश्चैनं श्रावय़ेच्छ्राद्धे व्राह्मणान्पादमन्ततः |
२०३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
यश्चैनमधिरूढः स इन्द्रः |
१७४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
यश्चैनमभिनन्देत यश्चैनमपवादय़ेत् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
यश्चैनमुत्पादय़ति यश्चैनं त्राय़ते भय़ात् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
यश्चैव देवान्खाण्डवे सव्यसाची; गाण्डीवधन्वा प्रजिगाय़ सेन्द्रान् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
यश्चैव लव्ध्वा न स्मरामीत्युवाच; दत्त्वा च यः कत्थति याच्यमानः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यश्चैवाप्रतिमो वीर्ये धृष्टकेतुर्महाय़शाः |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
यश्चैवैनं भय़स्थाने केशवं शरणं व्रजेत् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
यश्चैष पुरुषो जातः स्वेदात्ते विवुधोत्तम |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
यश्चोदितो भास्करेऽभूत्प्रनष्टे; सोऽप्यत्रात्रिर्भगवानाजगाम ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
यश्छिन्नविचिकित्सः सन्नाचष्टे सर्वसंशय़ान् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
यष्टव्यं क्रतुभिर्नित्यं दातव्यं चाप्यपीडय़ा |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
यष्टव्यं च यथाशक्ति यज्ञैर्विविधदक्षिणैः |
१४४ ख