अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
ये चैनं सम्प्रपद्यन्ते भक्तिय़ोगेन भारत |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३४
भीष्म उवाच
ये चैनमनुवर्तन्ते ते न यान्ति पराभवम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
ये चैनमुपसर्पन्ति ये च दूरं परं गताः |
१४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
ये चैव ते रथोदाराः पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
ये चैव भावा वर्तन्ते सर्व एष्वेव ते त्रिषु |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
ये चैव मां प्रशंसन्ति ये च निन्दन्ति मानवाः |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
ये चैवातिरथास्तत्र तथैव रथय़ूथपाः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
ये चैवान्ये कुरुमुख्या युवानः; पुत्राः पौत्रा भ्रातरश्चैव ये नः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
ये चैवाहुर्ये च नाहुर्ये चावश्यं वदन्त्युत ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
ये चोक्ता निय़मास्तेषां सर्वं कार्यं वुभूषता ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
ये जीर्यन्ते व्रह्मचर्येण विप्रा; व्राह्मीं वाचं परिरक्षन्ति चैव |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
ये जीवन्ति स्वधर्मेण सम्भुञ्जन्ते च पार्थिवाः |
३८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
ये तत्र निहता राजन्नन्तराय़ोधनं प्रति |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
ये तत्र भीमं ददृशुः समन्ता; द्दौःशासनं तद्रुधिरं पिवन्तम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
ये तत्र युद्धं कुर्वन्ति त्यक्त्वा जीवितमात्मनः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
ये तत्र वाजिनः शेषा गजाश्च मनुजैः सह |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
ये तत्रासन्समानीतास्ते दृष्ट्वा त्वामनागसम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
धृतराष्ट्र उवाच
ये तथा सात्यकिं यान्तं नैवाघ्नन्नाप्यवारय़न् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
ये तदा पारय़िष्यन्ति ते मां द्रक्ष्यन्ति वै नृपाः ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
ये तद्भक्ता वसन्ति स्म वनवासे तपस्विनः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
ये तपश्च तपस्यन्ति कौमारव्रह्मचारिणः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
ये तमेव प्रपद्यन्ते न ते मुह्यन्ति मानवाः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
ये तस्य क्षतमिच्छन्ति ते तस्य रिपवः स्मृताः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
ये तस्य यज्ञे संवृत्तास्तेऽपृच्छन्त कथं त्विमौ ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
ये तस्य वचनादेवमस्मान्व्रूत विचेतसः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
ये तु च्युताः सिद्धलोकात्क्रमेण; तेषां गतिं यान्ति तथानुपूर्व्या |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
ये तु तं संश्रिता देवं नानावर्णास्तदा जनाः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
श्रीभगवानु उवाच
ये तु तद्भाविता लोके एकान्तित्वं समास्थिताः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
ये तु तस्यैव देवस्य प्रादुर्भावाः सुरप्रिय़ाः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
ये तु तुष्टाः सुनिय़ताः सत्यागमपराय़णाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
जनमेजय़ उवाच
ये तु दग्धेन्धना लोके पुण्यपापविवर्जिताः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
ये तु दानं प्रय़च्छन्ति निश्चीरासङ्गमे नराः |
१२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
ये तु धर्मं प्रशंसन्तश्चरन्ति पृथिवीमिमाम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
ये तु धर्मं महाराज सततं पर्युपासते |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
ये तु धर्ममसूय़न्ते वुद्धिमोहान्विता नराः |
६३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
ये तु निन्दन्ति जल्पेषु न ताञ्श्राद्धेषु भोजय़ेत् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
ये तु पश्यन्ति तद्भावं मुच्यन्ते महतो भय़ात् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१३८
लोमश उवाच
ये तु पुत्रकृताच्छोकाद्भृशं व्याकुलचेतसः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
ये तु पुष्करनालस्य समवर्णा हय़ोत्तमाः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
ये तु पुष्करपत्रस्य तुल्यवर्णा हय़ोत्तमाः |
५७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
ये तु प्राज्ञाः स्थिताः सत्ये संसारान्तगवेषिणः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
ये तु मूढा दुराचारा विय़ोनौ मैथुने रताः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
ये तु विंशतिवर्षा वै त्रिंशद्वर्षाश्च मानवाः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
ये तु विद्यामुपादाय़ गुरुभ्यः पुरुषाधमाः |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
ये तु वुद्धा महात्मानो न प्रशंसन्ति कर्म ते ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३३
भीष्म उवाच
ये तु वुद्धिं परां प्राप्ता धर्मनैपुण्यदर्शिनः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
ये तु वुद्धिसुखं प्राप्ता द्वन्द्वातीता विमत्सराः |
२६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
ये तु वृक्षं निकृन्तन्ति मूषकाः सततोत्थिताः |
१० क