आदि पर्व
अध्याय
९३
शन्तनुरु उवाच
यस्याभिशापात्ते सर्वे मानुषीं तनुमागताः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
यस्याभिशापाद्दुःखार्तो दुःखं विन्दति नैषधः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
यस्यामाख्याय़ते पुण्या दिशि गोदावरी नदी |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
यस्यामास्ते स वरुणो वारुण्या सह भारत |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०६
सुपर्ण उवाच
यस्यामुदय़ते पूर्वं सर्वलोकप्रभावनः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
यस्यार्जुनः पदवीं केशवश्च; वृकोदरः सात्यकोऽजातशत्रोः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य वान्धवाः |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
यस्यार्थे वैरमस्माभिरासक्तं पाण्डवैः सह ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
यस्यार्थे शस्त्रमाधत्से यमवेक्ष्य च जीवसि |
११६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
यस्यावाच्यं न लोकेऽस्ति नाकार्यं वापि किञ्चन |
१० क
वन पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
यस्याविभक्तं वसु राजन्सहाय़ै; स्तस्य दुःखेऽप्यंशभाजः सहाय़ाः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
भीष्म उवाच
यस्याव्यक्तं न विदितं सगुणं निर्गुणं पुनः |
१०१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
यस्यासावात्मजो व्रह्मा सर्वस्य जगतः पिता |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
८७
धौम्य उवाच
यस्यास्तीरे सतां मध्ये यय़ातिर्नहुषात्मजः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
यस्यास्तु न भवेद्भ्राता पिता वा भरतर्षभ |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्यास्तु श्वशुरो धीमान्वाह्लीकः स कुरूद्वहः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
यस्यास्त्वं तृषितः पुत्र स्तनं पास्यसि देवज ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
यस्यास्मि कर्मणा प्राप्ता दुःखमेतदनन्तकम् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
यस्याहं प्रत्ययात्पार्थ गच्छेय़ं फल्गुनं प्रति ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
यस्याहमधिरुह्याङ्कं वालः किल गदाग्रज |
८७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
यस्याहवमुखे सौम्य स्थाता नैवोपपद्यते |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
इन्द्र उवाच
यस्याह्वानादागतोऽहं नरेन्द्र; प्रीतिर्मेऽद्य त्वय़ि मनुः प्रनष्टः ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
यस्याय़मगमत्कालश्चिन्तय़ानस्य मे विभो |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
यस्येच्छसि वधं तस्य गतमेवाद्य जीवितम् ||
११२ ग
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
यस्येतिहासो द्युतिमान्महाभारतमुच्यते ||
४६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
यस्येदं फलमद्येह मय़ा मूढेन भुज्यते ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
यस्येदमास्ये परिय़ाति विश्वं; तत्कालचक्रं निहितं गुहाय़ाम् ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
यस्येदृशस्ते धर्मोऽय़ं पितृभक्त्याश्रितोऽनघ |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्येन्द्रो वितते यज्ञे सोमं पीत्वा मदोत्कटः ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
यस्येमां गां विक्रममेकमाहु; स्तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्येषुपातमासाद्य नान्यस्तिष्ठेद्धनञ्जय़ात् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
यस्येह व्रणिनौ पादौ पद्भ्यां च परिसर्पति |
७२ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
सभ्या ऊचुः
यस्येय़ं चारुसर्वाङ्गी भार्या स्यादाय़तेक्षणा |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
यस्येय़ं फलनिर्वृत्तिरीदृश्यासादिता मय़ा |
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
यस्यैकषष्टिर्निशितास्तीक्ष्णधाराः; सुवाससः संमतो हस्तवापः ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
यस्यैतत्पाण्डुरं छत्रं विमलं मूर्ध्नि तिष्ठति ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
यस्यैतानि प्रय़ुज्यन्ते यथाशक्ति कृतान्यपि ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
यस्यैते निर्जिता लोके त्रिगुणाः पञ्च धातवः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
यस्यैते पूजिताः पार्थ तस्य लोकावुभौ जितौ ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
यस्यैवं वलमोजश्च स धर्मस्य प्रभुर्नरः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
धृतराष्ट्र उवाच
यस्यैष समतिक्रान्तो वधोपाय़ो जय़ं प्रति ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
यस्योत्तमं रूपमाहुः पृथिव्यां; यं पाण्डवाः परिरक्षन्ति सर्वे ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
यस्योदकं मधुपर्कं च गां च; नमन्त्रवित्प्रतिगृह्णाति गेहे |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
या कन्या दुहिता तस्या मत्स्या मत्स्यसगन्धिनी |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
या गतिः प्राप्यते येन प्रेत्यभावे चिरेप्सिता ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
या गतिः प्राप्यते येन प्रेत्यभावेषु भारत ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
या गतिः साङ्ख्ययोगानां स भवान्नात्र संशय़ः ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
या गतिर्गुरुणा प्राङ्मे प्रोक्ता रामेण तां स्मर ||
९८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
या गतिर्दैवतैर्दिव्या सा गतिस्त्वं सनातन ||
६० ख