शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तो रथवरो राजन्वासुदेवस्य धीमतः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
युक्तो वादित्रघोषेण तेषां रतिकरोऽभवत् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
युक्तो विवरमन्विच्छेदहितानां पुरन्दर ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
युक्तो ह्यटति निर्मुक्तो न चैकपुलिनेशय़ः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सात्यकिरु उवाच
युक्तो ह्यस्य प्रतीघातः कृतो मे कुरुपुङ्गवाः ||
४५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
युक्तोऽपि धर्मनित्यश्च न स्वर्गवासमाप्स्यसि ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
युक्तोऽस्य वधमन्विच्छेदप्रमत्तः प्रमाद्यतः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
युक्त्या दण्डं धारय़ित्वा प्रजानां; युद्धे क्षीणो मोदते देवलोके ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
युक्त्या दण्डं धारय़ित्वा प्रजानां; युद्धे क्षीणो मोदते देवलोके ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
युक्त्यादानं न चादानमय़ोगेन युधिष्ठिर ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
युक्त्वा तथाय़मात्मानं योगः पार्थिव निश्चलम् |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
युक्त्वा पाशुपतास्त्रेण त्रिपुरं समचिन्तय़त् ||
११५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
युक्त्वा महास्त्रेण परेण मन्त्रवि; द्विकृष्य गाण्डीवमुवाच सस्वनम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
युक्त्वा वाजिवरान्यत्तः कवची तिष्ठ दारुक ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
युक्त्वा सर्वात्मनात्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
युक्त्वा स्वर्गय़शोभ्यां च स्वेभ्यो मुदमुदावहत् ||
२२ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
युक्त्वात्मानं महातेजा जगाम गतिमुत्तमाम् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
युक्तय़ोगो महेष्वासः शरैर्वहुभिराचितः |
६१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
युगं चैवानुकर्षं च शरभूतमभूत्तदा ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
युगं द्वादशसाहस्रं कल्पं विद्धि चतुर्गुणम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८२
भीष्म उवाच
युगं रथेषा च तथैव चक्रे; तथैवाक्षः शरकृत्तोऽथ भग्नः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
युगं वा परिवर्तेत यद्येवं स्याद्यथात्थ माम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
वैशम्पाय़न उवाच
युगं समनुवर्तामि कालो हि दुरतिक्रमः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
युगकल्पसहस्राणि त्रीण्यावसति वै सुखम् ||
११० ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
युगक्षय़कृता धर्माः प्रार्थनानि विकुर्वते ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
युधिष्ठिर उवाच
युगक्षय़ात्परिक्षीणे धर्मे लोके च भारत |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
युगचक्राक्षभग्नैश्च द्रुताः केचिद्भय़ातुराः ||
१३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
युगन्धरं च भल्लेन रथनीडादपाहरत् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
युगन्धरस्ततो राजन्भारद्वाजं महारथम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१२९
लोमश उवाच
युगन्धरे दधि प्राश्य उषित्वा चाच्युतस्थले |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
युगन्धरे पय़ः पीत्वा प्रोष्य चाप्यच्युतस्थले |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
युगपच्च पृथक्चैव रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
युगपच्च समेतानां कार्याणां त्वं विचक्षणः |
८४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
युगपच्छैलपुत्र्याश्च गङ्गाय़ाः पावकस्य च ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
युगपत्तत्किरातश्च विकृष्य वलवद्धनुः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
युगपत्तस्य चिच्छेद शराभ्यां सैन्धवस्य ह |
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
युगपत्त्रीणि तेजांसि समेतान्यनुशुश्रुमः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
युगपत्पाण्डुपुत्राय़ चिक्षिपुः कङ्कपत्रिणः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
युगपत्पेततुरथ घोरौ परिघमार्गणौ |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
युगपत्पेततुर्वीरावुभाविन्द्रध्वजाविव ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
युगपत्पेततुर्वीरौ क्षिताविन्द्रध्वजाविव ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
युगपत्प्रापतंस्तत्र द्रोणस्य रथमन्तिकात् ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
युगपद्दिक्षु सर्वासु चित्राण्यस्त्राणि दर्शय़न् ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
युगपद्दिक्षु सर्वासु सर्वशस्त्राण्यदर्शय़त् ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
युगपद्योगमास्थाय़ ससर्ज विविधास्तनूः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
कर्ण उवाच
युगपन्न तु ते शक्याः कर्तुं सर्वे पुरःसराः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
युगपस्तृणपः कार्ष्णिर्नन्दिश्चित्ररथस्तथा |
४५ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
युगमध्ये तु भल्लैस्तु ततः स सधनुः कृपः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
युगमात्रोदिते सूर्ये कृत्वा पौर्वाह्णिकीः क्रिय़ाः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
युगमीषां वरूथं च तथैव ध्वजसारथी |
५ क