आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
यथाशक्त्या भगवता तदन्नं समुपार्जितम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
यथाशनिविनिष्पेषो वज्रस्येव च पर्वते |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११३
नारद उवाच
यथाशानाशनं लोके देहि नास्तीति वा वचः ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
यथाशास्त्रं नृपश्रेष्ठ चारय़िष्यति ते हय़म् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
यथाशुष्काणि यत्नेन ज्वलनार्थं द्रुतं यय़ौ ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
यथाश्रित्य महावृक्षं कक्षः संवर्धते महान् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
यथाश्रुतं महाराज किं भूय़ः श्रोतुमिच्छसि ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
यथाश्रुतं महाराज तदव्यग्रमनाः शृणु ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
यथाश्रुतं महाराज व्रुवतस्तन्निवोध मे ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
यथाश्रुतं यथादृष्टं तत्त्वेन नृपसत्तम ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
यथाश्रुतं यथादृष्टं पृष्टो व्राह्मणकाम्यया ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१०९
लोमश उवाच
यथाश्रुतमिदं पूर्वमस्माभिररिकर्शन |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
यथाश्रुतमिदं सर्वं समासेन द्विजोत्तम |
५१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
यथाश्रेष्ठं यथाज्येष्ठं पूजय़ेर्वचनान्मम ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०४
गुरुरु उवाच
यथाश्वत्थकणीकाय़ामन्तर्भूतो महाद्रुमः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
यथाश्वमेधावभृथस्तथा तन्मनुरव्रवीत् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
यथाश्वमेधावभृथे स्नाताः पूता भवन्त्युत |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
यथाश्वहृदय़ं वेद दाशार्हः परवीरहा |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
यथाश्वहृदय़ं वेद वासुदेवो महामनाः |
५० क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
यथाश्विनावाहतुस्तथा त्वं श्रेय़ोऽवाप्स्यसीति |
७७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
यथासञ्ज्ञो ह्ययं सम्यगन्तकाले न मुह्यति ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
यथासन्नमुपादाय़ निजघ्नतुरमर्षणौ ||
४५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
यथासमय़माज्ञाय़ तदा स नृपसत्तमः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
यथासमय़मेतस्मिन्वर्तस्व पुरुषोत्तम ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
यथासावुक्तवान्क्षुद्रो युय़ुत्सुर्वृष्णिसंनिधौ ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
राम उवाच
यथासि सृञ्जय़स्यास्य तथा मम नृपात्मजे |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
यथासीच्च निवृत्तेषु पाण्डवेषु च सञ्जय़ |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
यथासुखं जनः सर्वस्तिष्ठते याति वा तदा |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
यथासुखं त्वं जीवस्व प्राणानभ्युत्सृजामि ते |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
यथासुखं यथाजोषं जय़ोऽय़मनुभूय़ताम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
यथासुखं यथोत्साहं ललन्तु त्वय़ि पुत्रवत् ||
२७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
यथासुखं यथोद्देशं धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञय़ा ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
यथासुरान्कालकेय़ान्देवो वज्रधरस्तथा ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
७१
दमय़न्त्यु उवाच
यथासौ रथनिर्घोषः पूरय़न्निव मेदिनीम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
यथास्तां संमतौ राज्ञां पृथिव्यां राजसत्तमौ |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
यथास्थानं तु तौ स्थित्वा भूय़स्तं संववाहतुः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
यथास्थानविनिक्षिप्तैर्भूषितं वनराजिभिः ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
यथास्मान्सुरराट्शक्रो भय़ेभ्यः पाति सर्वदा |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
व्यास उवाच
यथास्मि चोदितो राज्ञा भवत्या पृथय़ैव च ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
यथास्मृति तु नामानि पन्नगानां निवोध मे |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
यथास्य जन्मनिधने न भवेतां पुनः पुनः ||
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
यथास्य दृश्यते रूपं कालान्तकय़मोपमम् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
यथास्य धर्मो न ग्लाय़ेन्नेय़ाच्छत्रुवशं यथा |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वासुदेव उवाच
यथास्य भविता मृत्युरचिरेणैव भारत ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
सुवर्चा उवाच
यथास्य भार्या सावित्री तपसा च दमेन च |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२८२
भारद्वाज उवाच
यथास्य भार्या सावित्री तपसा च दमेन च |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२८२
ऋषय़ ऊचुः
यथास्य भार्या सावित्री सर्वैरेव सुलक्षणैः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
यथास्य वुद्धिरभवद्धनुर्वेदे परन्तप ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
यथास्य श्रूय़ते शव्दो नदतो भैरवं स्वनम् |
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
यथास्य हृदय़ं भीतमल्पसत्त्वस्य संय़ुगे ||
२४ ख