उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
युक्तं सूतेन शिष्टेन वहुशो दृष्टकर्मणा |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तं हि यशसा क्षत्रं स्वर्गं प्राप्तुमसंशय़म् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
युक्तं हि यशसा युक्तं मरणं लोकसंमतम् ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तः परमय़ा प्रीत्या तावुवाच विशां पते ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तः पश्यसि देवर्षे गतीर्वै विविधा नृणाम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६३
वसिष्ठ उवाच
युक्तः संवरणो भर्ता दुहितुस्ते विहङ्गम ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
युक्तः समनुतिष्ठेत तुष्टश्चारैरुपस्कृतः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
युक्तः सम्यक्तथा योगी मोक्षं प्राप्नोत्यसंशय़म् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
कर्ण उवाच
युक्तः सेनापतिः कर्तुं द्रोणः शस्त्रभृतां वरः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
युक्तक्षमावुभावेतौ नातिवर्तेतमां कथम् ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
युक्तत्वं तच्च सञ्चिन्त्य नोत्तरं किञ्चिदव्रवीत् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
युक्तदण्डो न निर्दण्डो धर्मकार्यानुशासकः |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
युक्तमेतत्तृतीय़ाय़ां प्रकृतौ वर्तता त्वय़ा |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
१
मय़ उवाच
युक्तमेतत्त्वय़ि विभो यथात्थ पुरुषर्षभ |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
युक्तमेतन्महाभागे कुले जाते यशस्विनि |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तरूपः स हि गुरुरित्येवमनुचिन्त्य च ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
युक्तश्च युक्तवाहुश्च द्विविधश्च सुपर्वणः |
११७ क
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तश्चावां हि सम्वन्धो मत्स्यभारतसत्तमौ ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
युक्तस्य तु महाराज लक्षणान्युपधारय़ेत् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
युक्तस्य वा नास्त्यधर्मो धर्म एवेह शाश्वतः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तस्यैन्द्रेण योगेन पराक्रान्तस्य शुष्मिणः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
युक्तस्वप्नाववोधस्य योगो भवति दुःखहा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
युक्ता महत्सु कार्येषु श्रेय़ांस्युत्पादय़न्ति च ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
युक्ता यदा जानपदा भिक्षन्ते व्राह्मणा इव |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
युक्ता रथवरे यस्य सर्वशिक्षाविशारदाः ||
२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
युक्ता वहेय़ुर्यानानि यदि दण्डो न पालय़ेत् ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
कर्ण उवाच
युक्ताः कृतज्ञा ह्रीमन्त आहवेष्वनिवर्तिनः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
युक्ताचारं स्वविषय़े सन्धिविग्रहकोविदम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
युक्ताचाराश्च युक्ताश्च पौरस्य स्वजनस्य च ||
५ ग
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
युक्तानामेव तिष्ठन्ति वाहैरुच्चावचैर्वृताः ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
युक्तानीका महाराज भीष्ममेव समभ्ययुः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
युक्ताभरणवेषस्य कौन्तेय़स्य महात्मनः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
युक्ताश्च पार्वतीय़ानां रथाः पाषाणय़ोधिनाम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
युक्ताश्चाधीय़ते शास्त्रं यदा रक्षति भूमिपः ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
युक्ताश्चान्यैर्महादोषैर्ये नरास्तान्विवर्जय़ेत् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तितो ह्यनुपश्यामि निहतान्पाण्डवान्मृधे ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
युक्तिशास्त्रं च ते ज्ञेय़ं शव्दशास्त्रं च भारत |
१४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
युक्ते तस्मिन्हते वीराः प्राय़शो विमुखाभवन् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
युक्तेन श्रद्धय़ा सम्यगीहां समनुतिष्ठता ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
युक्तेनापि विभूतीनामपि वर्षशतैरपि ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
युक्तैः परमकाम्वोजैर्जवनैर्हेममालिभिः |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
युक्तैर्योगवहैः सद्भिर्ग्रीष्मे पञ्चतपैस्तथा |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तैर्वृहद्भिः सुरथैर्नृवीरा; स्तदाश्रमाय़ाभिमुखा वभूवुः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
युक्तो दुःखोचितश्चाहं विद्यापारगतस्तथा |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
युक्तो धर्मार्थय़ोर्ज्ञाने स राज्यमधिगच्छति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
युक्तो धारणय़ा कश्चित्सत्तां केचिदुपासते ||
२४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
युक्तो भवत्समो गोप्ता राज्ञामन्यो न विद्यते ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
युक्तो योगं प्रति सदा प्रतिसङ्ख्यानमेव च ||
२३ ख