शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
यो दुर्वलो भवेद्दाता कृपणो वा तपोधनः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
यो देवांश्च मनुष्यांश्च सर्पांश्चैकरथोऽजय़त् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५
कर्ण उवाच
यो द्रोणं समरे यान्तं नानुय़ास्यति संय़ुगे ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३४
वैशम्पाय़न उवाच
यो द्विष्याद्विवुधश्रेष्ठं देवं नाराय़णं हरिम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
७९
सहदेव उवाच
यो धनानि च कन्याश्च युधि जित्वा महारथान् |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
यो धर्ममर्थं कामं च यथाकालं निषेवते |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
कामन्द उवाच
यो धर्मार्थौ समुत्सृज्य काममेवानुवर्तते |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
उमो उवाच
यो धर्मो मुनिसङ्घस्य सिद्धिवादेषु तं वद ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
यो धर्मो यत्सुखं चैव द्विषतामस्तु तत्तथा ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
यो धर्मो यत्सुखं वा स्यात्सुहृदां तत्तथास्तु नः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
यो धर्मो यत्सुखं वा स्याद्द्विषतां तत्तथास्तु नः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यो धारय़ति भूतानि तस्मै प्राणात्मने नमः ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
यो धारय़ति भूतानि धरां चेमां सपर्वताम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
यो धावता न हातव्यस्तिष्ठन्नपि न हीय़ते |
५१ ख
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
यो धीरो धारय़ेद्रश्मीन्स स्यात्परमसारथिः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
यो न कामाद्भय़ाल्लोभात्क्रोधाद्वा धर्ममुत्सृजेत् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
यो न कामान्न संरम्भान्न भय़ान्नार्थकारणात् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
यो न कामय़ते किञ्चिन्न किञ्चिदवमन्यते |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
वासुदेव उवाच
यो न कालपरीतो वाप्यपि साक्षात्पुरन्दरः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
यो न जानाति निर्हन्तुं वस्त्राणां रजको मलम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९
भीष्म उवाच
यो न दद्यात्प्रतिश्रुत्य स्वल्पं वा यदि वा वहु |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
यो न दर्शय़ते तेजः क्षत्रिय़ः काल आगते |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
यो न देवैर्न गन्धर्वैर्नासुरैर्न महोरगैः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
यो न पश्यति चक्षुर्भ्यां नेङ्गते च कथञ्चन |
७८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
यो न पूरय़ितुं शक्यो लोभः प्राप्त्या कुरूद्वह |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
यो न मानय़ते द्वेषात्क्षत्रधर्मादपैति सः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
यो न याति प्रसङ्ख्यानमस्पष्टो भूमिवर्धनः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
यो न यातय़ते वैरमल्पसत्त्वोद्यमः पुमान् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
यो न वाय़ुवलाद्भग्नः पृथिव्यामिति मे मतिः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
धृतराष्ट्र उवाच
यो न व्यथति सङ्ग्रामे वीरः सत्यपराक्रमः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
यो न शक्यो मय़ा वक्तुं तमस्मै वक्तुमर्हसि |
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
यो न शक्यो वलात्कर्तुं देवैरपि सवासवैः |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
यो नः पुरा षण्ढतिलानवोच; त्सभामध्ये पार्थिवानां समक्षम् |
४५ क
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
यो नः सङ्ख्ये नौरिव पारनेता; जेता रिपूणां राजपुत्रस्तरस्वी |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
यो नः सङ्ग्रामाद्घोररूपाद्विमुच्ये; त्स नः पार्थान्समरे योधय़ेत ||
४९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
यो नः सुमनसां मूढ विभेदं कर्तुमिच्छसि ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
८८
यय़ातिरु उवाच
यो नः स्वर्गजितः सर्वान्यथावृत्तं निवेदय़ेत् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
यो नः स्वानिव दाय़ादान्धर्मेण परिरक्षति ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
यो नरः प्रीणय़त्यन्नैस्तस्य पुण्यफलं महत् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
यो नागात्सिन्धुराजस्य वर्त्म तं पूजय़ाम्यहम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
यो नात्युक्तः प्राह रूक्षं प्रिय़ं वा; यो वा हतो न प्रतिहन्ति धैर्यात् |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
यो नामन्यत वै नित्यमच्युतं न धनञ्जय़म् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
यो नार्चति यथाशक्ति स नृशंसो युधिष्ठिर ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
यो नित्यं क्षमते तात वहून्दोषान्स विन्दति |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
यो नित्यं स्पर्धते द्रोणं भीष्मं चैव महावलम् ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
यो निमित्तमनर्थानां वहूनां मम भारत ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
यो निर्वदेत संमोहाद्व्राह्मणं वेदपारगम् |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
यो नूनममिताय़ुः स्यादथ वापि प्रमाणवित् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
यो नैव कामान्न भय़ान्न लोभान्नार्थकारणात् |
३४ क