शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
प्रज्वलन्त्यः स्म दृश्यन्ते युक्तस्यामिततेजसः ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
प्रज्वलन्निव वेगेन संरम्भाद्रुधिरेक्षणः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
प्रज्वाल्य कृष्णवर्त्मानमुपागम्य रणे व्रतम् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रज्वाल्यतां हूय़तां चापि वह्नि; र्गृहाण पाणिं विधिवत्त्वमस्याः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
प्रज्वालय़न्ती गगनं दिशश्च विदिशस्तथा |
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
प्रडीनाः पक्षिणः काले वृक्षेभ्य इव मारिष ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
प्रणता भूमिपाश्चापि पेतुर्हीनाः स्वतेजसा |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
प्रणदत्सु च हृष्टेषु तावकेषु युय़ुत्सुषु ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३४
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणमध्वमेकमतय़ो यतय़ः; सलिलोद्भवोऽपि तमृषिं प्रणतः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
गालव उवाच
प्रणमन्तं परिष्वज्य मूर्ध्नि चाघ्राय़ पाण्डव |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
प्रणमे त्वाभिगम्याहं राजपुत्रीं निवोध माम् |
४० क
सभा पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणम्य पादावभिवाद्य हृष्टो; राजाव्रवीन्नारदं देवरूपम् ||
११४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणम्य वरदं देवमुवाच हरिमीश्वरम् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणम्य विकचः पादावगृह्णात्स पितुस्तदा |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
प्रणम्य शिरसा चैनं भीष्मं शरणमन्वय़ुः ||
५४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
प्रणम्य शिरसा चैनं मन्त्रं पृच्छाम माधव |
५२ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
प्रणम्य शिरसा तस्मै प्रतिय़ान्ति यथागतम् ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
प्रणम्य शिरसा देवमनङ्गाङ्गहरं हरम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणम्य शिरसा पार्थः प्राञ्जलिर्देवमैक्षत ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
प्रणम्य शिरसा भूमौ कार्यमस्मै न्यवेदय़त् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
प्रणम्य शिरसा राजन्नेवमस्त्वित्यथाव्रुवम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
प्रणम्य शिरसा शर्वं ततो वचनमाददे ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
प्रणम्य शिरसा सा च मय़ोक्ता पाण्डुनन्दन ||
५ ग
आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणम्य शिरसा हृष्टो जगृहे च परन्तपः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
प्रणवः सर्ववेदेषु शव्दः खे पौरुषं नृषु ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणश्येद्वो यशः सद्यो न तु सान्त्वे पराजय़ः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
प्रणाड्यस्तिस्र एवैताः प्रवर्तन्ते गुणात्मिकाः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणादं युध्यतो रात्रौ रौद्रं नित्यं प्रलक्षय़े ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणामं द्रोणकृपय़ोर्नात्यादृतमिवाकरोत् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
काल उवाच
प्रणाशहेतुर्नान्योऽस्य वध्यतेऽय़ं स्वकर्मणा ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
प्रणाशय़दमेय़ात्मा धृष्टद्युम्नस्य स द्विजः ||
१३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
कण्व उवाच
प्रणिधानेन धैर्येण रूपेण वय़सा च मे |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणिधाय़ शमीमूले प्राय़ादुत्तरसारथिः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
युधिष्ठिर उवाच
प्रणिधाय़ानुय़ास्यामो रक्षन्तः सर्वतोमुखाः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणिधाय़ेन्द्रिय़ग्रामं भर्तृलोकपराय़णे |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
प्रणिधींश्च ततः कुर्याज्जडान्धवधिराकृतीन् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणिपत्य च कौन्तेय़ः प्राञ्जलिर्वाक्यमव्रवीत् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणिपत्य ततः पूर्वं सूतपुत्रोऽभ्यभाषत ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणिपत्य ततः प्रीत्या भ्रातरं हृष्टमानसः |
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणिपत्य ततस्ते तु विधिवद्राजपुङ्गव |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
१०४
लोमश उवाच
प्रणिपत्य महावाहुः पुत्रार्थं समय़ाचत ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
प्रणिपत्य हि राजानं राज्यं यदि लभेमहि |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणिपत्य हृषीकेशमभिवाद्य पितामहम् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणिपत्याभिवाद्यैनं तस्थुः प्राञ्जलय़स्तदा ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०
सूत उवाच
प्रणिपत्याव्रुवंश्चैनमासीनं विश्वरूपिणम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
प्रणिपातं च गच्छेत काले शत्रोर्वलीय़सः |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
प्रणिपाते तु दोषोऽस्ति वन्धूनां शाश्वतीः समाः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
प्रणिपातेन चान्येषामुदतिष्ठत्सुय़ोधनः |
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
प्रणिपातेन तस्येन्द्रः परितुष्टो वरं ददौ |
३८ क