द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
यावत्तु शक्यते कर्तुमनुरक्तैर्जनाधिपैः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
यावत्ते पृथिवीं पार्था हत्वा भ्रातृशतं रणे |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
यावत्त्वं शापदोषेण कालमासिष्यसेऽनघ |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
यावत्त्वां निशितैर्वाणैः प्रेषय़ामि यमक्षय़म् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
यावत्पश्यामि चण्डालमाय़ान्तं शस्त्रपाणिनम् |
९१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
यावत्पार्थशरैर्घोरैर्निर्मुक्तोरगसंनिभैः |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
यावत्पार्थो न जानाति सात्यकिं वहुभिर्वृतम् ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
भीष्म उवाच
यावत्पुरस्तात्प्रतपेत्तावद्वै दक्षिणां दिशम् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
यय़ातिरु उवाच
यावत्पृथिव्यां विहितं गवाश्वं; सहारण्यैः पशुभिः पर्वतैश्च |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
यावत्प्रज्ञामन्ववर्तन्त तस्य; तावत्तेषां राष्ट्रवृद्धिर्वभूव ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
यावत्प्राणा धमिष्यन्ति धार्तराष्ट्रस्य मानद |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
यावत्प्राणाभिसन्धानं तावदिच्छेच्च भोजनम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
यावत्फल्गुननाराचा निर्मुक्तोरगसंनिभाः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
यावत्फल्गुनवाणानां गोचरं नाधिगच्छति |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यावत्यः सिकता राजन्गङ्गाय़ाः पुरुषर्षभ |
१११ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
यावत्षोडश वर्षाणि अशिवास्ते शिवास्ततः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
स्कन्द उवाच
यावत्षोडश वर्षाणि भवन्ति तरुणाः प्रजाः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
यावत्स भगवान्व्रह्मा न वुध्यति महातपाः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
यावत्स शव्दो भवति तावत्पुरुष उच्यते ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
यावत्स शव्दो भवति तावत्पुरुष उच्यते ||
६३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
यावत्सञ्जाय़ते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
यावत्सत्त्वं तमस्तावद्वर्तते नात्र संशय़ः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
यावत्सप्ततिवर्षाणि भवन्त्येते ग्रहा नृणाम् |
५६ क
विराट पर्व
अध्याय
४८
अर्जुन उवाच
यावत्समीक्षे सैन्येऽस्मिन्क्वासौ कुरुकुलाधमः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
यावत्स्थास्यन्ति गिरय़ः सरितश्च जनार्दन |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
यावत्स्थास्यन्ति गिरय़ो यावत्स्थास्यन्ति सागराः |
३६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
यावत्स्थास्यन्ति भूतानि निकृत्या ह्यसि पातितः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भृगुरु उवाच
यावदक्षिनिमेषाणि ज्वलते तावतीः समाः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
यावदद्य करोम्येतत्कामं तव महावल ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यावदद्य गवाश्वं स्यादारण्यैः पशुभिः सह |
३७ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
यावदद्य निहन्मि त्वां सहितं सर्वपाण्डवैः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
यावदन्तं च मे सौख्यं जात्यां जात्यां भविष्यति ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
यावदन्तं न कुरुते शत्रूणां शत्रुकर्शनः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
यावदन्तं न नय़ति शात्रवाञ्शत्रुकर्शनः ||
८३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
यावदन्तं हि दौरात्म्यं मद्रकेष्विति नः श्रुतम् ||
७४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११५
नारद उवाच
यावदन्यत्र गच्छामि शुल्कार्थं पृथिवीपते ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
यावदभ्यागता रौद्राः पिशाच्यस्ताः सुदारुणाः |
७३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
यावदस्थि मनुष्यस्य गङ्गातोय़ेषु तिष्ठति |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
यावदस्य पुनर्वुद्धिं विदुरो नापकर्षति |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
यावदस्य भवत्यस्मिँल्लोके कीर्तिर्यशस्करी |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
यावदस्य शितैर्वाणैः संरम्भं विनय़ाम्यहम् |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
यावदस्याः पय़ः पीत्वा सा सखी मम मानद |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
यावदस्यैव देवस्य देहं विशतु पातितः ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
यावदाख्याम्यहं चैतत्कृष्णाय़ाक्लिष्टकर्मणे ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१०२
लोमश उवाच
यावदागमनं मह्यं तावत्त्वं प्रतिपालय़ |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
यावदानन्दजाश्रूणि प्रमुञ्चन्तु नराधिपाः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
यावदावर्तय़ाम्यद्य चोरहस्ताद्धनं तव ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
यावदावेद्यते राज्ञे हतः कर्णोऽर्जुनेन वै ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
यावदाहारय़ेत्तावत्प्रतिगृह्णीत नान्यथा ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१८
अर्जुन उवाच
यावदिच्छति पुत्राणां दातुं तावद्ददाम्यहम् ||
३ ख