द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
यस्य मन्त्री च गोप्ता च पार्श्वतस्ते जनार्दनः ||
१०६ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य मन्त्री च गोप्ता च सुहृच्चैव जनार्दनः |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च |
३४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
यस्य मे त्वं महीपाल दुःखान्येतान्यवाप्तवान् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
यस्य मे त्वं रणे पाप चक्षुर्विषय़मागतः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नाग उवाच
यस्य मे त्वं विशालाक्षि भार्या सर्वगुणान्विता ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
यस्य मे त्वं हृषीकेश यथेप्सितमुपस्थितः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
युधिष्ठिर उवाच
यस्य मे पुरुषव्याघ्र भवान्नाथो महावलः ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
पुत्र उवाच
यस्य मे भवती नेत्री भविष्यद्भूतदर्शिनी ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य यज्ञे महानासीद्यूपः श्रीमान्हिरण्मय़ः |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य यज्ञेषु राजेन्द्र शतसङ्ख्येषु वै पुनः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य यज्ञो वभूवेह वह्वन्नो वहुदक्षिणः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
यस्य यत्र ह्यनुष्ठानं तत्र तत्र निरामय़म् ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
यस्य यद्धि रणे न्यङ्गं पितृतो मातृतोऽपि वा |
५७ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य यद्विहितं वीर सोऽवश्यं तदुपाश्नुते ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य यन्ता गतः षण्ढो मन्येऽहं न स जीवति ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य यन्ता हृषीकेशः शीलवृत्तसमो युधि |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य यन्ता हृषीकेशो योद्धा यस्य धनञ्जय़ः |
३६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य यस्य च यः कामस्तस्मिन्कालेऽभवत्तदा |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
यस्य यस्य च वीभत्सुर्वधे यत्नं करिष्यति |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८८
व्यास उवाच
यस्य यस्य मतं यद्यच्छ्रोतुमिच्छामि तस्य तत् ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४०
उत्तर उवाच
यस्य याते न पश्यन्ति भूमौ प्राप्तं पदं पदम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९५
वामदेव उवाच
यस्य योधाः सुसन्तुष्टाः सान्त्विताः सूपधास्थिताः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५०
नाग उवाच
यस्य रश्मिसहस्रेषु शाखास्विव विहङ्गमाः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
यस्य राजन्गजानीकं वहुसाहस्रमद्भुतम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
यस्य राज्ञः प्रदृश्यन्ते स राजा राजसत्तमः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
यस्य राज्ञो नरास्तात सात्त्विकीं वृत्तिमास्थिताः |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
यस्य रुक्ममय़ी माला शिरस्येषा विराजते |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
युधिष्ठिर उवाच
यस्य लोकास्त्रय़ो वश्या विष्णोरिव महात्मनः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३७
द्रोण उवाच
यस्य लोके समो नास्ति कश्चिदन्यो धनुर्धरः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
यस्य लोभाद्विनिहताः समरे क्षत्रिय़र्षभाः ||
७२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
यस्य लोभाभिभूतस्य मतिं समनुवर्तसे |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नाग उवाच
यस्य वक्तव्यतां यान्ति विशेषेण भुजङ्गमाः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
यस्य वर्त्मानुवर्तेते मृत्युवैवस्वतावुभौ ||
४९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य वस्त्वरते वुद्धिर्मरणाय़ स माधवम् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य वा मनुजस्येदं न क्षान्तं मद्विचेष्टितम् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१८७
द्रुपद उवाच
यस्य वा मन्यसे वीर तस्य कृष्णामुपादिश ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
यस्य वाङ्मनसी गुप्ते सम्यक्प्रणिहिते सदा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
यस्य वाङ्मनसी स्यातां सम्यक्प्रणिहिते सदा |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
वासुदेव उवाच
यस्य वापि न तौ स्यातां किं नु दुःखतरं ततः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
यस्य वासः कुरुक्षेत्रे खाण्डवे चाभवत्सदा |
१४४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य वाहुप्रतापेन तापिताः सर्वतो वय़म् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य वाहुवलं घोरं कौरवाः पर्युपासते |
३२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य वाहुवलं घोरं धार्तराष्ट्रैरुपासितम् ||
१५ ग
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य वाहुवलं प्राप्य न भवन्त्यसुहृद्गणाः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
यस्य वाहुवलं सर्वे पाण्डवाः समुपाश्रिताः |
७० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
यस्य वाहुवलं सर्वे वय़माश्रित्य जीविताः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
यस्य वाहुवलं सर्वे समाश्रित्य महात्मनः |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य वाहुवलं सेन्द्राः सुराः सर्व उपासते |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
यस्य वाहुवलाद्वीर सभा चासीत्पुरा मम |
१८ क