chevron_left  यस्मान्ममाकृतार्थाय़ास्त्वय़ाarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १७३
गन्धर्व उवाच
यस्मान्ममाकृतार्थाय़ास्त्वय़ा क्षुद्र नृशंसवत् |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मान्मा त्वं सरिच्छ्रेष्ठे वञ्चय़ित्वा पुनर्गता |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
यस्मान्मिथ्योपचरितो अस्त्रलोभादिह त्वय़ा |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
यस्मान्मूढो मम सदो नागतोऽसौ वकाधमः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
यस्मान्मे अशुच्यन्नं ददासि तस्मदन्धो भविष्यसीति ||
१२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मान्मे वसवो जह्रुर्गां वै दोग्ध्रीं सुवालधिम् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय १४५
व्राह्मण उवाच
यस्मिँल्लोकाः प्रसूतिश्च स्थिता नित्यमथो सुखम् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
यस्मिंश्च प्रलय़ं यान्ति पुनरेव युगक्षय़े ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
यस्मिंश्च यद्येन च यश्च कर्ता; तत्कारणं तं समुपाय़माहुः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
यस्मिंश्च सर्वभूतानि प्रलय़ं यान्ति सङ्क्षय़े |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
यस्मिंश्चैते वसन्त्यर्हास्तद्राष्ट्रमभिवर्धते ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
यस्मिंस्तच्छ्रूय़ते सत्यं ज्योतिर्व्रह्म सनातनम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
यस्मिंस्तु देवाः समय़े सन्तिष्ठेरंस्तथा भवेत् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
यस्मिंस्तु पच्यते कालस्तं न वेदेह कश्चन ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११
भीष्म उवाच
यस्मिंस्तु भावेन वसामि पुंसि; स वर्धते धर्मय़शोर्थकामैः ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिंस्ते कुण्डले वद्धे तदा द्विजवरेण वै ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
यस्मिञ्जाते ददौ द्रोणो गवां दशशतं धनम् |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय १८
द्रौपद्यु उवाच
यस्मिञ्जाते महाभागे कुन्त्याः शोको व्यनश्यत |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिञ्जाते महावाहुः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
६२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
यस्मिञ्जाते महावीर्ये शन्तनुर्लोकशङ्करे |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिञ्जिते जितं ते स्यात्पुमानेकः स दृश्यताम् ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
धृतराष्ट्र उवाच
यस्मिञ्जय़ाशा सततं पुत्राणां मम सञ्जय़ |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
यस्मिञ्जय़ाशां पुत्राणाममन्यत स पार्थिवः |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
यस्मिञ्शक्रो व्राह्मणैः पूज्यमानः; सदस्योऽभूद्धरिमान्देवराजः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
यस्मिञ्शाखा यजुर्वेदे सोऽहमाध्वर्यवे स्मृतः ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
यस्मिञ्शौर्यमानृशंस्यं तपश्च; प्रज्ञा शीलं श्रुतिसत्त्वे धृतिश्च |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
यस्मिन्करोति विश्वासमिच्छतस्तस्य जीवति ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
यस्मिन्कस्मिन्कुले जाता वहुपुत्राः शताय़ुषः |
१०० क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
जनमेजय़ उवाच
यस्मिन्काले च देशे च यथा च वदतां वर |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १०४
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्काले जपन्नास्ते स वीरः सत्यसङ्गरः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
यस्मिन्काले महावीर्यः स राजासीन्महाधनः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
यस्मिन्काले सुमनसः सर्वे वृद्धानुपासते |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्क्षमा च क्रोधश्च दानादाने भय़ाभय़े |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
यस्मिन्गृद्धो धृतराष्ट्रः सपुत्रः; कस्मादेषां कलहो नात्र मूर्च्छेत् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११
भीष्म उवाच
यस्मिन्गृहे हूय़ते हव्यवाहो; गोव्राह्मणश्चार्च्यते देवताश्च |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
यस्मिन्दानं दमः शौचमहिंसा ह्रीर्धृतिः क्षमा |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
यस्मिन्देवा अधि विश्वे विषक्ता; स्तावश्विनौ मुञ्चतो मा विषीदतम् ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
शक्र उवाच
यस्मिन्देवाश्च यज्ञाश्च यस्मिन्वेदाः प्रतिष्ठिताः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
व्रह्मो उवाच
यस्मिन्देशे करिष्यध्वं यज्ञं काश्यपनन्दनाः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
यस्मिन्देशे च काले च मापनेय़ं प्रवर्तिता |
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
यस्मिन्देशे तु तान्यासन्पतितानि नभस्तलात् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
यस्मिन्द्वीपे समाश्रित्य युध्यन्ति कुरवः परैः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
यस्मिन्धर्मो विराजेत तं राजानं प्रचक्षते |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
यस्मिन्धृतिरनुक्रोशः क्षमा सत्यं पराक्रमः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
यस्मिन्धृतिर्वुद्धिपराक्रमौजो; दमः सत्यं वीरगुणाश्च सर्वे |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
यस्मिन्न नश्यन्ति गुणाः कौन्तेय़ पुरुषे सदा |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
यस्मिन्न विभ्रमाः केचिद्दृश्यन्ते मनुजर्षभ |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
यस्मिन्न शक्यते कर्तुं यत्नस्तन्नानुचिन्तय़ेत् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
विश्वामित्र उवाच
यस्मिन्न हिंसा नानृते वाक्यलेशो; भक्ष्यक्रिय़ा तत्र न तद्गरीय़ः ||
८४ ख
वन पर्व
अध्याय १८४
सरस्वत्यु उवाच
यस्मिन्नग्निमुखा देवाः सेन्द्राः सह मरुद्गणैः |
२५ क