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शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यानि स्थानानि दिव्यानि विवुधानां शुभानने |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १४०
वैशम्पाय़न उवाच
यानिमानाश्रिताकार्षीरप्रिय़ं सुमहन्मम |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
धृतराष्ट्र उवाच
यानिमानाहुः स्वस्य धर्मस्य लोका; न्द्विजातीनां पुण्यकृतां सनातनान् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
यानीमानि वहिर्वेद्यां दानानि परिचक्षते |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
व्यास उवाच
यानीमान्युत्तमानीह वेदोक्तानि प्रशंससि |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
यानीह रमणीय़ानि वनान्युपवनानि च |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
यानीहागमशास्त्राणि याश्च काश्चित्प्रवृत्तय़ः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
जनमेजय़ उवाच
यानुद्दिश्य तु सङ्कल्पः पय़सोऽस्य कृतो मय़ा |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
यानुद्दिश्य रणे पार्थः पदवन्धं चकार ह |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
यानुपाश्रित्य जीवन्ति प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ६६
वृहदश्व उवाच
यानेन भरतश्रेष्ठ स्वन्नपानपरिच्छदाम् ||
२१ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
यानेन महता पार्थो वहिर्निष्क्रामय़त्तदा ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
यानेन वै प्रापणं च श्मशाने; शौचेन नूनं विधिना चैव दाहः ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
अर्जुन उवाच
यानेव हत्वा न जिजीविषाम; स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११
भीष्म उवाच
यानेषु कन्यासु विभूषणेषु; यज्ञेषु मेघेषु च वृष्टिमत्सु |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
यानैः स्त्रीसहिताः सर्वे पुरं प्रविविशुस्तदा ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १५९
वैशम्पाय़न उवाच
यानैरनुय़युर्यक्षा राक्षसाश्च सहस्रशः ||
३० ख
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
यानैरश्वैर्गजैश्चैव श्रीमन्तस्तिग्मतेजसः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
यानैरुच्चावचैर्जग्मुर्विदुरेण पुरस्कृताः ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
यानैर्वहुविधैरन्ये पद्भिरेव तथापरे ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय २११
वैशम्पाय़न उवाच
यानैर्हाटकचित्राङ्गैश्चञ्चूर्यन्ते स्म सर्वशः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७१
भीष्म उवाच
यान्गुणांस्तु गुणोपेतः कुर्वन्गुणमवाप्नुय़ात् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय ४
युधिष्ठिर उवाच
यान्तु द्वारवतीं शीघ्रमिति मे वर्तते मतिः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ५५
वृहदश्व उवाच
यान्तो ददृशुराय़ान्तं द्वापरं कलिना सह ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १५९
अर्जुन उवाच
यान्तो व्रह्मविदः सन्तः सर्वे रात्रावरिन्दम ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
यान्दृष्टवानसि विभो तारारूपाणि भूतले ||
३५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
आस्तीक उवाच
यान्दृष्ट्वा हीय़ते पापं तेभ्यः कार्या नमस्क्रिय़ाः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४६
भीष्म उवाच
यान्पूजय़न्तो विन्दन्ति स्वर्गमाय़ुर्यशः सुखम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ६९
ऋतुपर्ण उवाच
यान्मन्यसे समर्थांस्त्वं क्षिप्रं तानेव योजय़ ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
यान्यगम्यानि तीर्थानि दुर्गाणि विषमाणि च |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
यान्यव्रवीदमेय़ात्मा तानि मे शृणु भारत ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
यान्यांश्च ददृशे भीमश्चक्षुर्विषय़मागतान् |
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
यान्यानमन्यद्योग्यांश्च येषु येष्विह कर्मसु |
१५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
यान्युक्तानि त्वय़ा भीरु वाक्यानि मधुघातिनः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
यान्युवाच च देवर्षिर्लोमशः सुमहातपाः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
यान्येव पुरुषः कुर्वन्सुखैः कालेन युज्यते |
८५ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
यान्वुद्ध्वा पुरुषः सम्यक्सर्वज्ञत्वमवाप्नुय़ात् |
१९८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
यान्वय़ं नाभिजानीमः कस्ताञ्ज्ञातुमिहार्हति |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६९
भीष्म उवाच
यान्समेष्यामि समरे न तु कुन्तीसुतान्नृप ||
२१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २६
धृतराष्ट्र उवाच
यान्सुपर्णाश्च गृध्राश्च विकर्षन्ति ततस्ततः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
द्रोण उवाच
यान्स्म तान्ग्लहते घोराञ्शकुनिः कुरुसंसदि |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
यान्स्म तान्ग्लहते तातः शकुनिः कुरुसंसदि |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
यापि चैवंविधा नारी भर्तारमनुवर्तते |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४५
भीष्म उवाच
यापुत्रकस्याप्यरिक्थस्य प्रतिपत्सा तदा भवेत् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
याप्यस्त्वमसि पार्थैश्च सर्वैश्चान्धकवृष्णिभिः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
याप्सु श्लेष्म पुरीषं वा मूत्रं वा मुञ्चतां गतिः |
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
याभिः सूक्ष्माः प्रताय़न्ते धमन्योऽन्याः सहस्रशः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
अर्जुन उवाच
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
याभिर्व्याप्तास्त्रय़ो लोकाः कल्याणीभिश्चराचराः ||
२ ख