शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
यस्मै वाचं सुप्रशस्तां वदन्ति; स वै देवान्गच्छति संय़तात्मा ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्मै हिरण्यं ववृषे मगह्वान्परिवत्सरम् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
यस्य कन्यास्ति भूतस्य ये मय़ेह प्रकीर्तिताः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
यस्य कन्याह्रदे वासो देवलोकं स गच्छति ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य कर्माणि भूरीणि कथय़न्ति द्विजातय़ः ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य कर्मानुजीवन्ति लोके सर्वधनुर्भृतः |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
यस्य कामो वर्तते नित्यमेव; नान्यः शमाद्भारतानामिति स्म |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
यस्य कार्यमकार्यं वा युध्यतः स्यात्समं रणे |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य कार्यमकार्यं वा सममेव भवत्युत |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य कीरित्र्महेष्वासान्सर्वानभिभविष्यति ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
यस्य कुर्वन्ति वचनं सेन्द्रा देवाश्चमूमुखे ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भय़ं रतिः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वाङ्गसन्धिषु |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य कोपान्महेष्वासौ भीष्मद्रोणौ निपातितौ ||
४८ ख
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
यस्य कोपो महावाधः प्रसादश्च महाफलः |
२७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
यस्य क्षतजसन्दिग्धौ वाहू चन्दनरूषितौ |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
यस्य क्षेत्रादप्युदकं क्षेत्रमन्यस्य गच्छति |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
यस्य घोषेण दैत्यानां विमुह्यन्ति दिशो दश |
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
यस्य चर्षेर्वसिष्ठस्य त्वय़ा पुत्रा विनाशिताः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
यस्य चात्मसमो लोको धर्मज्ञस्य मनस्विनः |
३४ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
यस्य चानेन धर्मज्ञ भुक्तमन्नं वलीय़सः |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
यस्य चान्नानि भुञ्जीत यश्च स्याच्छरणागतः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
यस्य चारश्च मन्त्रश्च नित्यं चैव कृताकृते |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य चार्थार्थमेवार्थः स च नार्थस्य कोविदः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
९३
शन्तनुरु उवाच
यस्य चैव कृतेनाय़ं मानुषेषु निवत्स्यति ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
यस्य ज्यातलनिर्घोषात्समकम्पन्त शत्रवः |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
यस्य ज्यातलशव्देन शरवृष्टिरवेण च |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
यस्य तारार्कचित्रोऽसौ रथे ध्वजवरः स्थितः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
यस्य ते जय़माशास्ते विश्वभुक्त्रिदशेश्वरः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
लिखित उवाच
यस्य ते तपसो वीर्यमीदृशं द्विजसत्तम ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
यस्य ते भ्रातरः शूरा दुर्जय़ाः शत्रुसूदनाः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
यस्य ते भ्रातरः शूराः सर्वलोकस्य धन्विनः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६७
व्यास उवाच
यस्य ते सञ्जय़ो दूतो यस्त्वां श्रेय़सि योक्ष्यते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५०
नाग उवाच
यस्य तेजोविशेषेषु नित्यमात्मा प्रतिष्ठितः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
यक्ष उवाच
यस्य तेऽर्थाच्च कामाच्च आनृशंस्यं परं मतम् |
७४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
यस्य तोमरसङ्घाटा भेरीमण्डूककच्छपा |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तय़े |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
यस्य त्वं कर्कशो भ्राता पलाय़नपराय़णः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
यस्य त्वं न भवेस्त्राता प्रतीय़ात्को नु मानवः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
दारुक उवाच
यस्य त्वं पुरुषव्याघ्र सारथ्यमुपजग्मिवान् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
यस्य दस्युगणा राष्ट्रे ध्वाङ्क्षा मत्स्याञ्जलादिव |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
यस्य दानजितं मित्रममित्रा युधि निर्जिताः |
६७ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
यस्य दिव्यानि कर्माणि कथय़न्ति मनीषिणः ||
१९४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
यस्य दिव्यानि कर्माणि प्रवदन्ति मनीषिणः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य दिव्यानि कर्माणि प्रवदन्ति मनीषिणः |
७३ क
वन पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य दीर्घौ समौ पीनौ भुजौ परिघसंनिभौ |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१५०
युधिष्ठिर उवाच
यस्य दुर्योधनो वीर्यं चिन्तय़न्नमितौजसः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
यस्य दोषैः प्रकुपितं चित्तं मुह्यति देहिनः |
५३ क