शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
यदा हि शोचतां शोको व्यसनं नापकर्षति |
८७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
यदा ह्यभीक्ष्णं सुवहून्प्रकारा; ञ्श्रोतास्मि तानावसथे कुरूणाम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
यदा ह्ययमिहैवान्यैः प्राकृतैर्दुःखितो भवेत् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
यदा ह्यसौ सुखदुःखे जहाति; मुक्तस्तदाग्र्यां गतिमेत्यलिङ्गः |
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
यदा ह्यस्य गिरो रूक्षाः शृणोमि कटुकोदय़ाः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
यदा ह्यासीदतः पापान्दहत्युग्रेण तेजसा |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदा ह्येनं तर्कय़ते दुरात्मा; तच्चाप्ययं सहतेऽस्मान्समीक्ष्य ||
८२ ख
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
यदा ह्येनं परिवृतं कन्याभिर्देवरूपिणम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
यदा ह्येनं विघूर्णन्तमपश्यं पार्थसाय़कैः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
यदागमवतः पुंसस्तदपत्यं प्रजाय़ते |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
धृतराष्ट्र उवाच
यदाजानीत तां शक्तिमेकघ्नीं सततं रणे |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
यदाजौ निधनं याति सोऽस्य धर्मः सनातनः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
यदाजौ निहतः शेते सद्भिः समभिपूजितः ||
९२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
यदाज्ञानेन कुर्वीत गुणसर्गं पुनः पुनः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
शक्र उवाच
यदातिष्ठः समुद्रस्य पूर्वकूले विलेलिहन् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
यदात्थ मां त्वं प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
यदात्मद्रव्यमाय़ुष्मन्देहसंश्रय़णान्वितम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
यदात्मना स्वमात्मानं प्रशंसेत्पुरुषः प्रभो |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
यदात्मानं न जानीते तदाव्यक्तमिहोच्यते ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२५
व्यास उवाच
यदादित्यं स्थितं मध्ये गूहन्ति शिखिनोऽर्चिषः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासय़तेऽखिलम् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
यदादित्यमिवापश्यत्पतितं भुवि सञ्जय़ |
५८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
यदादिमध्यपर्यन्तं ग्रहणोपाय़मेव च |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
यदाधर्मसमाविष्टो धनं गृह्णाति तस्करः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
यदानृताः स्त्रिय़स्तात सहधर्मः कुतः स्मृतः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
यदानेन समं सर्वं किमिदं मम दीय़ते |
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
यदापकृष्टः स रथान्न्यासितश्चाय़ुधं भुवि |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
यदाप्तदक्षिणैर्यज्ञैर्यजते श्रद्धय़ान्वितः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
यदाप्नोति पतिर्भार्यामिह लोके परत्र च ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
यदाभिभवितुं वाणैर्नैव शक्नोमि तं रणे |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
यदाभिमन्युं परिवार्य वालं; सर्वे हत्वा हृष्टरूपा वभूवुः |
१३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
यदाभिमन्युं वहवो जघ्नुर्युधि महारथाः ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदाभिमन्युः परवीरघाती; शरैः परान्मेघ इवाभिवर्षन् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
यदाभिमन्युर्निहतो धार्तराष्ट्रैर्दुरात्मभिः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
यदाभिषिक्तो भगवान्सेनापत्येन पावकिः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
यदाभ्याद्रवत द्रोणं तदासीद्वो मनः कथम् ||
४६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
यदारभ्य क्रिय़ां काञ्चिद्भय़ादिह निवर्तते ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
यदार्जुनं मत्तमिव द्विपो द्विपं; समभ्ययादाधिरथिर्जिघांसय़ा ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
यदार्जुनेन ते वीराः कथिताः पञ्च पाण्डवाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९५
वामदेव उवाच
यदार्यजनविद्विष्टं कर्म तन्नाचरेद्वुधः |
१० क
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
यदावधीत्पितॄन्भ्रातॄन्गुरून्पुत्रान्सखीनपि ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
८३
इन्द्र उवाच
यदावमंस्थाः सदृशः श्रेय़सश्च; पापीय़सश्चाविदितप्रभावः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
यदावमानं लभते महान्तं; तदा जीवन्मृत इत्युच्यते सः ||
६५ ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
अष्टक उवाच
यदावसो नन्दने कामरूपी; संवत्सराणामय़ुतं शतानाम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
यदाश्चर्यमचिन्त्यं च गिरौ हिमवति प्रभो |
४८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
जनमेजय़ उवाच
यदाश्चर्यमभूत्किञ्चित्तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
यदाश्चर्यमभूत्तस्मिन्वाजिमेधे महाक्रतौ ||
९१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
यदाश्रित्याभिय़ुय़ुधे धार्तराष्ट्रं सुय़ोधनम् ||
१९ ग
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
यदाश्रौषं कर्ण उवाच भीष्मं; नाहं योत्स्ये युध्यमाने त्वय़ीति |
१२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
यदाश्रौषं कर्णघटोत्कचाभ्यां; युद्धे मुक्तां सूतपुत्रेण शक्तिम् |
१४२ क