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द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
युय़ुत्सुः शितपीताभ्यां क्षुराभ्यामच्छिनद्भुजौ ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
युय़ुत्सुः शोकसंमूढः प्राप्तकालमचिन्तय़त् ||
७५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुत्सुः सञ्जय़श्चैव गान्धारी च यशस्विनी |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुत्सुः सञ्जय़श्चैव तत्कर्तास्म्यहमञ्जसा |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुत्सुना च कौरव्यो युय़ुधानेन चाभिभो ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुत्सुमग्रतः कृत्वा ददुस्तोय़ं महात्मने ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
युय़ुत्सुरु उवाच
युय़ुत्सुरपि तां रात्रिं स्वगृहे न्यवसत्तदा ||
९२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
युय़ुत्सुर्जामदग्न्यस्य प्रमुखे वीतभीः स्थितः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
युय़ुत्सुर्नाशकद्योद्धुं पार्थस्तानन्तराच्छिनत् ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय १७७
धृष्टद्युम्न उवाच
युय़ुत्सुर्वातवेगश्च भीमवेगधरस्तथा |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुत्सुर्वासुदेवेन वासुदेवमुवाच ह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुत्सुर्विदुरश्चैव सञ्जय़श्च महाद्युतिः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
युय़ुत्सुर्व्यूह्य सैन्यानि प्राय़ात्तव सुतैः सह ||
१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुत्सुश्च महातेजा धौम्यश्चैव पुरोहितः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
युय़ुत्सुश्चापि कृष्णेन श्रुतो वीरानुपालभन् ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुत्सुश्चापि कौरव्यः प्रेक्षकास्त्वितरेऽभवन् ||
८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
युय़ुत्सुश्चापि कौरव्यो मुक्तः पाण्डवसंश्रय़ात् ||
३३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुत्सुश्चापि मेधावी वैश्यापुत्रः स कौरवः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
युय़ुत्सुस्तु ततो राजञ्शितधारेण पत्रिणा |
२ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
युय़ुत्सूनां मय़ा सार्धं पर्यवर्तन्त भारत ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
युय़ुत्सूनामिवाकाशे पतत्रिवरभोगिनाम् ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
युधिष्ठिर उवाच
युय़ुत्सो वासुदेवश्च वय़ं च व्रूम सर्वशः ||
९२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुत्सोर्धार्तराष्ट्रस्य पूजां चक्रे महाय़शाः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
युय़ुत्सय़ा द्रोणमुखान्महारथा; न्समासदत्सिंहशिशुर्यथा गजान् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
युय़ुधाते गरुत्मन्तौ यथा नागामिषैषिणौ ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधाते तवार्थाय़ यथा स समय़ः कृतः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधाते महात्मानौ कुरुसात्वतपुङ्गवौ ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधाते महामाय़ौ राक्षसप्रवरौ युधि ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधाते महावीर्याविन्द्रवैरोचनाविव ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधाते महावीर्यौ परस्परजिघांसय़ा ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधाते रणे वीरौ सौभद्रकुरुपुङ्गवौ ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानं च गोविन्द इदं वचनमव्रवीत् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानं परित्यज्य रणे प्राय़मुपाविशत् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानं महावाहुं गच्छन्तमनिवर्तिनम् ||
३७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २४
गान्धार्यु उवाच
युय़ुधानं महेष्वासं गर्हय़न्निव दृश्यते ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानं महेष्वासमिदं वचनमव्रवीत् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानः पुनर्द्रोणं विव्याध दशभिः शरैः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानः सहाय़ो मे प्रमथिष्यति कौरवान् ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुधानद्वितीय़ं च धृष्टद्युम्नममर्षणम् ||
४४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वासुदेव उवाच
युय़ुधानद्वितीय़ेन पञ्च शिष्टाः स्म पाण्डवाः ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुधानद्वितीय़ो वै व्यथितेन्द्रिय़मानसः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानप्रभृतय़ो माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ||
७ ख
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुधानमथाभ्यघ्नन्नुच्छिष्टैर्भाजनैस्तदा ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानमनन्विष्य लोको मां गर्हय़िष्यति ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानमविध्येतां समन्तान्निशितैः शरैः ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानरथं त्यक्त्वा द्रोणानीकाय़ दुद्रुवुः ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
जनमेजय़ उवाच
युय़ुधानश्च विक्रान्तो देवैरपि दुरासदः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानश्च संय़त्ता युद्धाय़ैव मनो दधुः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
युय़ुधानस्ततो वीरः सात्वतानां महारथः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानस्तु तं राजन्प्रत्युवाच हसन्निव |
१४ क