कर्ण पर्व
अध्याय
२३
शल्य उवाच
युध्यतः पाण्डवाग्र्येण यथा त्वं वीर मन्यसे ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
युध्यतः पाण्डुपुत्रस्य सूतपुत्रोऽस्त्रमाय़या ||
४३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
युध्यतः समरेऽन्येन प्रमत्तस्य निपातितः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
युध्यतस्तेन ते पाप भूमिश्चक्रं ग्रसिष्यति ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
युध्यतां काममाचार्यो नाहं योत्स्ये धनञ्जय़म् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
युध्यतां तु तथा तेषां कुर्वतां कर्म दुष्करम् |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
युध्यतां पाण्डवाञ्शक्त्या तेषां चास्मान्युय़ुत्सताम् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
युध्यतां हि तथा राजन्विशेषो न व्यदृश्यत |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
युध्यतामेव तेषां तु भास्करेऽस्तमुपागते |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
युध्यते राक्षसो नूनं धार्तराष्ट्रैर्महारथैः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
युध्यते स भवेद्व्यक्तमपध्यातो महत्तरैः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
युध्यतेऽसौ रणे कर्णो दंशितः सर्वपार्थिवैः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
युध्यतो वहुभिस्तात कः सहाय़ोऽभवन्मम ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
युध्यतोरपतद्रेतस्तच्चापि यमुनाम्भसि ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
युध्यतोर्हि द्वय़ोर्युद्धे नैकान्तेन भवेज्जय़ः ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
युध्यतोश्चापि वां कालो व्यतीतः सुमहानिह ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
युध्यतोऽय़ुध्यतो वापि वेतनं मासकालिकम् |
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
युध्यध्वं परय़ा शक्त्या यतध्वं च वधे मम |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
युध्यध्वं मा पलाय़ध्वं माय़ैषा राक्षसी रणे |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
युध्यध्वं सहिता यत्ता निहनिष्यामि वो रणे ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
युध्यध्वं सहिताः सर्वे किं वो राजा करिष्यति ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
युध्यध्वमग्रतो यावत्पृष्ठतो हन्मि पाण्डवान् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
युध्यध्वमनहङ्कारा यतो धर्मस्ततो जय़ः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
युध्यध्वमनहङ्काराः किं चिरं कुरुथेति च ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
युध्यध्वमिति मा भैष्ट युद्धाद्भरतसत्तमाः ||
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
युध्यध्वमिति संहृष्टाः पुनः पुनररिन्दमः |
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
युध्यन्तं कौरवान्सङ्ख्ये पातय़न्तं च सूतजम् |
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
युध्यन्ति ते यथान्याय़ं शक्तिमन्तश्च संय़ुगे |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
युध्यन्ते मामकं सैन्यं यदवध्यन्त सञ्जय़ ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
युध्यन्ते वहवः शूरा लम्वते च दिवाकरः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
युध्यन्तौ कृपवार्ष्णेय़ौ येऽपश्यंश्चित्रय़ोधिनौ |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
युध्यन्नहं नाभिजानामि किं चि; न्मा सैन्यं स्वं छादय़िष्ये पृषत्कैः ||
१० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
युध्यमानं महेष्वासं विनिघ्नन्तं पराञ्शरैः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
युध्यमानं रणे कर्णं कुरुवीरोऽभ्यपालय़त् ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
युध्यमानं रणे शूरं विप्रचित्तिमिवामराः |
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
युध्यमानं वलात्सङ्ख्ये विजिग्ये पाण्डवर्षभः ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
४०
अर्जुन उवाच
युध्यमानं विमर्देऽस्मिन्कुर्वाणं भैरवं महत् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
द्रोण उवाच
युध्यमानं सुसंरव्धं शरवर्षौघवर्षिणम् ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
युध्यमानं हि मां हित्वा प्रदक्षिणमवर्तत ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
युध्यमानस्य तस्याजौ चिन्तय़न्नेव भारत |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
युध्यमानस्य ते तुल्याः सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
युध्यमानस्य देवस्य प्रादुर्भवति तत्सदा ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
युध्यमानस्य पार्थेन शार्दूलेनेव हस्तिनः ||
६७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
युध्यमानस्य मे वीर गन्धर्वैः सुमहावलैः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
युध्यमानस्य सङ्ग्रामे प्राप्तस्यैकाय़ने भय़म् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
युध्यमानस्य सङ्ग्रामे भीष्मस्य भरतर्षभ |
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
युध्यमाना हताः सङ्ख्ये ते गन्धर्वैः समागताः ||
१३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
गान्धार्यु उवाच
युध्यमाना हि कौरव्याः कृन्तमानाः परस्परम् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
युध्यमानांस्तु ताञ्शूरान्मनुजेन्द्रः प्रतापवान् |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
धृतराष्ट्र उवाच
युध्यमानान्यथाशक्ति घटमानाञ्जय़ं प्रति |
४ क