chevron_left  यत्तुarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
गरुड उवाच
यत्तु ध्वजस्थानगतो यत्नात्परिचराम्यहम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
यत्तु निःश्रेय़सं सम्यक्तच्चैवासंशय़ात्मकम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सात्यकिरु उवाच
यत्तु पार्थेन मत्स्नेहात्स्वां प्रतिज्ञां च रक्षता |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७५
अम्वो उवाच
यत्तु मां भगवान्रामो वक्ष्यति द्विजसत्तम |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय ५
शल्य उवाच
यत्तु मां मन्यसे राजन्कुरुराज करोमि तत् |
२५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
युधिष्ठिर उवाच
यत्तु मामनुशास्तीह भवानद्य हिते स्थितः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
यत्तु मे कथितं तात मुनिभिर्भावितात्मभिः |
३६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
द्रौणिरु उवाच
यत्तु मे भगवानाह तन्मे कार्यमनन्तरम् |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
यत्तु मे वचनस्यास्य कथितस्य प्रय़ोजनम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
यत्तु लिङ्गान्तरगतं पृच्छसे मां युधिष्ठिर |
३ क
सभा पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तु वक्ष्यामि तत्सर्वं शृणुध्वं वसुधाधिपाः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय ११
डुण्डुभ उवाच
यत्तु वक्ष्यामि ते वाक्यं शृणु तन्मे धृतव्रत |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
यत्तु वाचा मय़ा शक्यं कर्मणा चापि पाण्डव |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
यत्तु वाहुवलं नाम कनिष्ठं वलमुच्यते ||
४८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २५
शल्य उवाच
यत्तु विद्वन्प्रवक्ष्यामि प्रत्ययार्थमहं तव |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
यत्तु शक्तिमता कार्यं सततं हितकारिणा |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तु शक्यं मय़ा कर्तुं भूय़ एव तवेप्सितम् |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
यत्तु शक्यं मय़ा कर्तुं वृद्धेनाद्य नृपोत्तम |
४१ क
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तु शक्यमिहास्माभिस्तान्वै सञ्चिन्त्य पाण्डवान् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
यत्तु शौनकसत्रे ते भारताख्यानविस्तरम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
यत्तु संमोहसंय़ुक्तमव्यक्तविषय़ं भवेत् |
२२ क
स्त्री पर्व
अध्याय ७
विदुर उवाच
यत्तु संसारगहनं वनमाहुर्मनीषिणः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८६
दुर्योधन उवाच
यत्तु सत्कारसंय़ुक्तं देय़ं वसु जनार्दने |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
यत्तु सन्तापसंय़ुक्तं काय़े मनसि वा भवेत् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
यत्तु सन्तापसंय़ुक्तमप्रीतिकरमात्मनः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तु सा वृहती श्यामा एकवस्त्रा सभां गता |
८५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
कुन्त्यु उवाच
यत्तु सा वृहती श्यामा सभाय़ां रुदती तदा |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
यत्तुभ्यं रोचते कृष्ण स्वस्ति प्राप्नुहि कौरवान् |
८९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४३
कुन्त्यु उवाच
यत्तुष्यन्त्यस्य पितरो माता चाप्येकदर्शिनी ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
यत्ते कार्यं महाभाग क्रिय़तां तदनन्तरम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
यत्ते कार्यं सपुत्रस्य क्रिय़तां तदकालिकम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
यत्ते कुन्ती महावाहो जातस्यैच्छद्धनञ्जय़ |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १९२
धृतराष्ट्र उवाच
यत्ते कुशलिनो वीरा मित्रवन्तश्च पाण्डवाः ||
२२ ग
वन पर्व
अध्याय १४८
वैशम्पाय़न उवाच
यत्ते तदासीत्प्लवतः सागरं मकरालय़म् |
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
यत्ते तेन करिष्यन्ति कृतं तेन भविष्यति |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
नाचिकेत उवाच
यत्ते दातुं गोसहस्रं शतं वा; शतार्धं वा दश वा साधुवत्साः |
५२ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
यत्ते दैवं परं सत्त्वं यच्च ते मातरिश्वनः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्ते पथ्यतमं राजंस्तस्मिंस्तिष्ठ परन्तप ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
यत्ते पुत्रास्तदाकार्षुर्हते देवव्रते मृधे ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
यत्ते पुरस्तादभवत्समृद्धं; द्यूते हृतं पाण्डवमुख्य राज्यम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
यत्ते पृष्टं तन्मय़ा चोपदिष्टं; याथातथ्यं तद्विशोको भवस्व |
९० क
आदि पर्व
अध्याय १३९
राक्षस्यु उवाच
यत्ते प्रिय़ं तत्करिष्ये सर्वानेतान्प्रवोधय़ |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
यत्ते भिन्नं च दग्धं च यच्च किञ्चिद्विनाशितम् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
यत्ते भृशतरं दानाद्वर्तय़िष्यामि तच्छृणु ||
२ ग
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
यत्ते भ्रातॄंश्च मां चैव दृष्ट्वा न व्यथते मनः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
यत्ते भय़ममित्रघ्न हृदि सम्परिवर्तते ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
यत्ते मनोगतं वीर तद्व्रूहि वितराम्यहम् |
४५ ख
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
यत्ते मम परिज्ञाने कौतूहलमरिन्दम |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १३१
श्येन उवाच
यत्ते मांसानि गात्रेभ्य उत्कृत्तानि विशां पते |
२९ क