सभा पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
या वै युक्ता मतिः सेय़मर्जुनेन प्रदर्शिता ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
या वै यूय़ं सोऽहमद्यैकभावो; युष्मान्दत्त्वा चाहमात्मप्रदाता |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
या वै विद्याः साधय़न्तीह कर्म; तासां फलं विद्यते नेतरासाम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
या शक्तिर्यच्च ते वीर्यं यज्ज्ञानं यच्च पौरुषम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
या सञ्ज्ञा विहिता लोके दासे शुनि वृके पशौ |
५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
या सा नारी वृहत्काय़ा अधितिष्ठति तत्र वै |
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
या सा वसिष्ठस्य मुनेः सर्वकामधुगुत्तमा ||
१३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
या सा वाल्यात्प्रभृत्यस्मान्पर्यवर्धय़तावला |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
या सा समृद्धिः पार्थानामिन्द्रप्रस्थे वभूव ह |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
या साध्वी निय़ताचारा सा भवेद्धर्मचारिणी ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
या हि दृष्टा मय़ा काश्चिच्छ्रुता वापि वराङ्गनाः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
या हि शक्या महाराज साम्ना दानेन वा पुनः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
या हि सा दीप्यमानेव पाण्डवान्भजते पुरा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
या हि सूर्यसहस्रस्य समस्तस्य भवेद्द्युतिः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
युधिष्ठिर उवाच
या हीनाः पतिभिः पुत्रैर्मातुलैर्भ्रातृभिस्तथा ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
धृतराष्ट्र उवाच
या ह्यस्य परमा शक्तिर्जय़स्य च पराय़णम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
५३
शौनक उवाच
यां कथां व्याससम्पन्नां तां च भूय़ः प्रचक्ष्व मे ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२०८
मार्कण्डेय़ उवाच
यां कपर्दिसुतामाहुर्दृश्यादृश्येति देहिनः |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
यां कृतां नानुकुर्युस्ते मानवाः प्रेक्ष्य विस्मिताः |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
यां गतिं क्षत्रिय़स्याहुः प्रशस्तां परमर्षय़ः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
यां गतिं प्राप्नुवन्तीह ज्ञाननिर्मलवुद्धय़ः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
यां गतिं साधवो यान्ति तां गतिं व्रज पुत्रक ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
सुधन्वो उवाच
यां च भाराभितप्ताङ्गो दुर्विवक्ता स्म तां वसेत् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५८
मार्कण्डेय़ उवाच
यां चकार स्वय़ं त्वष्टा रामस्य महिषीं प्रिय़ाम् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
यां चापि शक्तिं त्रिदशाधिपस्ते; ददौ महात्मा भगवान्महेन्द्रः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
यां ज्ञात्वा नाभिशोचन्ति व्राह्मणास्तत्त्वदर्शिनः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
यां तरन्ति कृतप्रज्ञा धृतिमन्तो मनीषिणः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
यां तां पुण्यतमां लोके कौशिकीति विदुर्जनाः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यां तां वने दुःखशय़्यामुवास; प्रव्राजितः पाण्डवो धर्मचारी |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
यां तां श्रिय़मसूय़ामः पुरा यातां युधिष्ठिरे |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
यां तु कृष्णार्जुनौ सेनां यां सात्यकिवृकोदरौ |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२०८
मार्कण्डेय़ उवाच
यां तु दृष्ट्वा भगवतीं जनः कुहुकुहाय़ते |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
यां तु पृच्छसि मा राजन्दिव्यामेतां शशाकृतिम् |
५२ क
सभा पर्व
अध्याय
५१
शकुनिरु उवाच
यां त्वमेतां श्रिय़ं दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रे युधिष्ठिरे |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
यां त्वय़ापहृतां भीष्म कन्यां नैषितवान्नृपः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३३
भीष्म उवाच
यां दिशं विद्यया यान्ति यां च गच्छन्ति कर्मणा |
४ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
यां न कृष्णो न वीभत्सुर्नाभिमन्युर्न सृञ्जय़ः |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
६२
द्रौपद्यु उवाच
यां न मृष्यन्ति वातेन स्पृश्यमानां पुरा गृहे |
६ क
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
यां न वाय़ुर्न चादित्यः पुरा पश्यति मे प्रिय़ाम् |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
६२
द्रौपद्यु उवाच
यां न वाय़ुर्न चादित्यो दृष्टवन्तौ पुरा गृहे |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
यां न सङ्क्षमसे मोहाद्दिव्यां पार्थस्य सत्क्रिय़ाम् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९६
नारद उवाच
यां प्राप्य सुरतां प्राप्ताः सुराः सुरपतेः सखे ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
यां प्रीतिं पाण्डुपुत्रेभ्यः समवाप तदा नृपः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यां यक्षः पुरुषं चक्रे भीष्मस्य निधने किल |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
यां यक्षः पुरुषं चक्रे स्थूणः प्रिय़चिकीर्षय़ा ||
१०४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
यां यां घटोत्कचो युद्धे माय़ां दर्शय़ते नृप |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
यां यां प्रत्युद्ययौ सेनां तां तां ज्येष्ठः स पाण्डवः |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
यां यामपश्यत्कन्यां स सा सा तस्य मनोऽहरत् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
यां यामवस्थां पुरुषोऽधिगच्छे; त्तस्यां रमेतापरितप्यमानः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
यां यामिच्छेत्तनुं देवः कर्तुं कार्यविधौ क्वचित् |
७३ क