सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
येन सा तपसा शक्या कर्मणा वापि गोपते ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
व्राह्मण उवाच
येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५०
दुर्योधन उवाच
येन साधारणी वृत्तिः स शत्रुर्नेतरो जनः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
युधिष्ठिर उवाच
येन सिद्धिं परां प्राप्तस्तन्नो व्याख्यातुमर्हसि ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०४
व्याध उवाच
येन सिद्धिरिय़ं प्राप्ता मय़ा व्राह्मणपुङ्गव ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
येन सृष्टः पराभूतो यात्येव न निवर्तते |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
येन स्म युज्यते वाय़ुस्ततो लोकान्विवात्यसौ ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
येन स्म युज्यते सूर्यस्ततो लोकान्विराजते ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
येनकेनचिदाच्छन्नः स गोव्रत इहोच्यते ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
येनाच्छिन्नं तत्तमः पार्थ घोरं; यत्तत्तिष्ठत्यर्णवं तर्जय़ानम् ||
८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
कृप उवाच
येनाजौ निहता भूमावशेरत पुरा द्विषः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
येनाजय़द्देवपतिर्वलिं वैरोचनिं पुरा ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
येनापत्रपते साधुरसाधुस्तेन तुष्यति ||
६० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
येनाभिगुप्ताः सङ्ग्रामे जय़ेमासुहृदो वय़म् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
येनाभिद्रुत्य तरसा समस्तं राजमण्डलम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
येनाभिभविता शत्रून्रणे पार्थो धनञ्जय़ः ||
२६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
येनाभिभूतः पुरुषो मरणं वहु मन्यते ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
येनाभिषिक्तो नृपतिर्वारुणं गुणमृच्छति |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
येनार्जुनस्तेन राजन्कृतास्त्राः; प्रय़ाता वै ते त्रिगर्ताश्च शूराः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
येनाविव्रुवता प्रश्नं तथा कृष्णा सभां गता |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
येनावृतः कुरुते सम्प्रय़ुक्तो; घोराणि कर्माणि सुदारुणानि ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
येनाश्रय़ं वेदय़न्ते पुराणं; मनीषिणो मानसमानभक्तम् |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
येनासि वहुशो रूक्षं चोदितः सूर्यनन्दन ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
येनासुरान्पराजित्य जगत्पाति शतक्रतुः ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
येनासौ व्यजय़त्कृत्स्नां प्रतीचीं दिशमाहवे |
५१ क
सभा पर्व
अध्याय
११
युधिष्ठिर उवाच
येनासौ सह शक्रेण स्पर्धते स्म महाय़शाः ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
येनास्नेहो वलं धत्ते यस्तं वेद स वेदवित् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
येनास्माकं हृतो भार आसीनानां सुखावहः ||
१७ ग
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
येनास्म्युद्विग्नहृदय़ः समुत्पन्नशिरोज्वरः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
येनाहं कुन्तिभोजाय़ धनं धूर्तैरिवार्पिता ||
६१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
धृतराष्ट्र उवाच
येनाहं कुरुशार्दूल न शक्नोमि विचेष्टितुम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
येनाहं चलितः स्थानादिति राजा व्यचिन्तय़त् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
येनाहं भवता वुद्धो मेधावी ह्यसि काश्यप ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
येनाहं भृशसंविग्नो व्याघूर्णित इव द्रुमः ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अम्वो उवाच
येनाहं वशमानीता समुत्क्षिप्य वलात्तदा ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
येनाहं वीर्यशुल्केन पण्यस्त्रीवत्प्रवेरिता ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
येनाहमभिसन्तप्तो न नक्तं न दिवा शय़े ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
येनाय़ं सृज्यते जन्तुस्ततोऽन्यः पूर्वमेति तम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
येनाय़जन्त यज्वानः पुण्यलोकपराय़णाः ||
५३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३८
वाय़ुरु उवाच
येनेदं निखिलं विश्वं जनितं स्थावरं चरम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
येनेदं व्यसनं प्राप्ता भवन्तो द्यूतकारितम् ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
येनेदमीरितं वाक्यं ममैव तनय़ं प्रति |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
राजो उवाच
येनेमं वर्जय़ेथास्त्वं कर्मणा पक्षिसत्तम |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
येनेमं शत्रुसङ्घातं मतिपूर्वेण वञ्चय़े ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
येनैतद्दीर्घकालं नो भुक्तं राज्यमकण्टकम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०४
गुरुरु उवाच
येनैतद्वर्तते चक्रमनादिनिधनं महत् ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
येनैव ते पितुर्दत्तं यतमानस्य संय़ुगे ||
२६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
येनैव राजन्नर्थेन तदेवास्मा उपाकुरु ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
येनैवान्यः प्रभवति सोऽपरानपि वाधते |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
येनैष कुरुशार्दूल शार्दूल इव चेदिराट् |
४ क