भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
यज्ञानां जपय़ज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालय़ः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
यज्ञानामपि यो यज्ञः शिवानामपि यः शिवः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
यज्ञान्तकृद्यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ||
११८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञान्दीक्षास्तथा होमान्यच्चान्यन्मृगय़ामहे |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञान्समुद्दिश्य च दक्षिणार्थे; लोकान्विजेतुं परमां च कीर्तिम् ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
यज्ञान्साधय़ साधुभ्यः स्वाद्वन्नान्दक्षिणावतः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञार्थं चक्रतुश्चित्तं धनार्थं च विशेषतः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
यज्ञार्थं प्रक्ष्यति व्यक्तं नेति वक्ष्यामहे वय़म् ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
यज्ञार्थं राजभिर्दत्तं महान्तं धनसञ्चय़म् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
यज्ञार्थं स ततोऽर्थार्थी तपोऽतप्यत दारुणम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
यज्ञार्थमन्यद्भवति यज्ञे नार्थस्तथापरः |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
यज्ञार्थमृत्विजं द्रष्टुं स च मां नाभ्यनन्दत ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽय़ं कर्मवन्धनः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
यज्ञार्थानि हि सृष्टानि यथा वै श्रूय़ते श्रुतिः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
यज्ञार्थे पशवः सृष्टा इत्यपि श्रूय़ते श्रुतिः |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
यज्ञाश्च दक्षिणाश्चैव ग्रहाः स्तोभाश्च सर्वशः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
यज्ञाश्चैषां हृताः सर्वे पितृभ्यश्च स्वधा तथा ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञाय़ सृष्टानि धनानि धात्रा; यष्टादिष्टः पुरुषो रक्षिता च |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञाय़तनदेशेषु दत्त्वा शुद्धं च काञ्चनम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
यज्ञाय़तनमाश्रित्य सूतपुत्रपुरःसराः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
यज्ञाय़ाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीय़ते ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
यज्ञिय़ं तं विना ह्यश्वं नागन्तव्यं हि पुत्रकाः ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञिय़ं विषय़ान्ते मां नाय़ोत्सीः किं नु पुत्रक ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
यज्ञिय़ानां च वृक्षाणामय़ज्ञिय़ान्निवोध मे |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञिय़ार्थाः प्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणतः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५७
भीष्म उवाच
यज्ञिय़ाश्चैव ये वृक्षा वेदेषु परिकल्पिताः |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४३
आस्तीक उवाच
यज्ञे कुरुकुलश्रेष्ठ तस्य लोकावुभौ जितौ ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञे तव महाराज व्राह्मणानुपतस्थिरे ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
यज्ञे तस्य महाराज पाण्डुपुत्रस्य धीमतः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
यज्ञे ते भरतश्रेष्ठ राजसूय़ेऽर्हणां प्रति |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञे यस्य श्रीः स्वय़ं संनिविष्टा; यस्मिन्भाण्डं काञ्चनं सर्वमासीत् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
यज्ञे वा भुजगास्तस्मिञ्शतशोऽथ सहस्रशः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यज्ञे विभूतिं तां दृष्ट्वा दुःखामर्षान्वितस्य च |
१०० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
जनमेजय़ उवाच
यज्ञे सक्ता नृपतय़स्तपःसक्ता महर्षय़ः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
यज्ञेन तपसा चैव दानेन च नराधिप |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७३
भीष्म उवाच
यज्ञेषु गोप्रदानेषु द्वय़ोरपि समागमे ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
यज्ञेषु पशवो व्रह्मन्वध्यन्ते सततं द्विजैः |
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
महेश्वर उवाच
यज्ञेषु सर्वेषु मम न भाग उपकल्पितः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
यज्ञेषु सुहुतां विप्रैर्वसोर्धारां महात्मभिः ||
२३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
यज्ञेषूपाकृतं विश्वं प्राहुरुत्तमसञ्ज्ञितम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
व्यास उवाच
यज्ञेष्वग्रहरः प्रोक्तो यज्ञधारी च नित्यदा ||
८७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
यज्ञैराप्याय़ते सोमः स च गोषु प्रतिष्ठितः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञैरिन्द्रो विविधैरन्नवद्भि; र्देवान्सर्वानभ्ययान्महौजाः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
यज्ञैरिष्ट्वा सर्ववेदानधीत्य; दारान्कृत्वा पुण्यकृदावसेद्गृहान् ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
जनमेजय़ उवाच
यज्ञैरिष्ट्वा हि वहवो राजानो द्विजसत्तम |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
यज्ञैरेव महात्मानो वभूवुरधिकाः सुराः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
यज्ञैर्दानैश्च राजानो भवन्ति शुचय़ोऽमलाः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
यज्ञैर्दानैस्तपसा राजधर्मै; र्मान्धाताभूद्गोप्रदानैश्च युक्तः ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
यज्ञैर्यजन्ते ये केचिद्याजय़न्ति च ये द्विजाः |
१३ क