chevron_left  यत्पृथिव्यांarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
यत्पृथिव्यां पुण्यतमं विद्यास्थानं तदावसेत् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
कश्यप उवाच
यत्पृथिव्यां व्रीहिय़वं हिरण्यं पशवः स्त्रिय़ः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
यत्पृथिव्यां व्रीहिय़वं हिरण्यं पशवः स्त्रिय़ः |
६९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
यत्प्रवक्ष्यामि तत्सर्वं यथावदुपपद्यते ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
यत्प्रवेदय़से वित्तं वहुत्वेन खलु त्वय़ा |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
यत्प्रशस्तं च लोकेषु पुण्यं यच्च शुभाशुभम् |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७६
भृगुरु उवाच
यत्प्राणाः सर्वभूतानां वर्धन्ते येन च प्रजाः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
यत्प्राप्तकालं मन्येथास्तत्कुर्याः पुरुषोत्तम ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय २०१
पितामह उवाच
यत्प्रार्थितं यथोक्तं च काममेतद्ददानि वाम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
धृतराष्ट्र उवाच
यत्प्राविशदमेय़ात्मा किं पार्थः प्रत्यपद्यत ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
धृतराष्ट्र उवाच
यत्प्राविशन्महेष्वासः पाञ्चालानपराजितः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
यत्प्राश्य पुरुषो मर्त्यो अमरत्वं निगच्छति ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
यत्प्राश्य प्रसवेत्तस्य पत्नी शक्रसमं सुतम् ||
१० ग
सभा पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्प्राह शास्त्रं भगवान्वृहस्पतिरुदारधीः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २८८
कुन्त्यु उवाच
यत्प्रिय़ं च द्विजस्यास्य हितं चैव तवानघ |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
कुशिक उवाच
यत्प्रीतोऽसि समाचारात्कुलं पूतं ममानघ ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
युधिष्ठिर उवाच
यत्फलं तस्य भवति तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
युधिष्ठिर उवाच
यत्फलं तिलदाने च भूमिदाने च कीर्तितम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२०
नारद उवाच
यत्फलं दानशीलस्य क्षमाशीलस्य यत्फलम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
यत्फलं व्राह्मणस्येह मोक्षार्थश्च यदात्मकः |
५१ क
वन पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र कञ्चिद्वय़ं कालं वसन्तः सत्यविक्रमम् |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
यत्र कर्णं हतं श्रुत्वा जीवामीह सुदुःखितः ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
यत्र कर्णं हतं श्रुत्वा नात्यजज्जीवितं नृपः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र कर्मेदृशं धर्म्यं द्विजेन कृतमच्युत ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
यत्र कुत्सा प्रय़ोक्तव्या भीष्म वालतरैर्नरैः |
६ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
यत्र कृष्णमृगा राजन्व्याधेन परिपीडिताः |
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
यत्र कृष्णो दय़ापन्नः सन्धिमिच्छन्महाय़शाः |
१४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
यत्र कृष्णौ च कृष्णा च सत्यभामा च भामिनी ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
यत्र कौन्तेय़ वस्तव्यं सपुत्रभ्रातृवन्धुना |
२ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
यत्र क्रतुशतैरिष्ट्वा देवराजो दिवं गतः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
यत्र क्रीडितमस्माभिस्तदा राजन्समागतैः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
यत्र खं तत्र पवनस्तत्राग्निर्यत्र मारुतः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
यत्र गङ्गा महाराज स देशस्तत्तपोवनम् |
८३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
यत्र गत्वा न म्रिय़ते यत्र गत्वा न जाय़ते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
यत्र गत्वा न शोचन्ति न च्यवन्ति व्यथन्ति च |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २४७
व्यास उवाच
यत्र गत्वा न शोचन्ति न व्यथन्ति चलन्ति वा |
४० क
वन पर्व
अध्याय १७७
युधिष्ठिर उवाच
यत्र गत्वा न शोचन्ति भवतः किं विवक्षितम् ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र गर्गेण वृद्धेन तपसा भावितात्मना |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
यत्र गृत्समदो व्रह्मन्व्राह्मणैः स महीय़ते ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
यत्र गृद्धाः पाण्डुसुता यत्र मे सज्जते मनः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र चापश्यत स वै तिरो वर्षाणि वर्षति |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
भीष्म उवाच
यत्र चाश्वशिरा राजन्वेदान्पठति शाश्वतान् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
यत्र चेर्ष्या नास्ति नारीनराणां; तत्र त्वाहं हस्तिनं यातय़िष्ये ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र चैकान्तिनो यान्ति नाराय़णपराय़णाः ||
६१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १५
शौनक उवाच
यत्र जज्ञे महावीर्यः सोऽश्वराजो महाद्युतिः ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
यत्र ज्ञानवतां प्राप्तिरलिङ्गग्रहणा स्मृता ||
४८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
जनक उवाच
यत्र तत्र कथं जाताः स्वय़ोनिं मुनय़ो गताः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
यत्र तत्र रमे नित्यमहं सत्येन ते शपे ||
२९ ख