अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
यज्ञभृद्यज्ञकृद्यज्ञी यज्ञभुग्यज्ञसाधनः |
११८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
यज्ञमित्यपरे धीराः प्रदानमिति चापरे |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञमित्येव राजानः स्पर्धमाना ददुर्धनम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
यज्ञमेकान्ततः कृत्वा तत्संन्यस्य तपश्चरेत् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
यज्ञमेके प्रशंसन्ति संन्यासमपरे जनाः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
उमा उवाच
यज्ञमेतं महाभाग किमर्थं नाभिगच्छसि |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
यज्ञमेवोपजीवन्ति नास्ति चेष्टमराजके ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञवाटं नृपा दृष्ट्वा परं विस्मय़मागमन् |
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञवाटस्य ते भूमिः कृष्यतां तेन भारत ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञवाटे तु यत्किञ्चिद्धिरण्यमपि भूषणम् |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञवाहः प्रवाहश्च देवय़ाजी च सोमपः |
६५ क
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
यज्ञवाहाश्च ये मन्त्राः सर्वे तत्र समासते ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
यज्ञविघ्नं करिष्यामो दीय़तां दक्षिणा इति |
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञविघ्नमिमं कर्तुं नार्हस्त्वं हव्यवाहन ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञविद्याङ्गविद्भिश्च क्रमद्भिश्च क्रमानपि |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति व्रह्म सनातनम् |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
यज्ञशीलः कर्मरतिर्धृतिमान्संय़तेन्द्रिय़ः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
श्रीरु उवाच
यज्ञशीलः पुरा भूत्वा मामेव यजतेत्ययम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
यज्ञशूरा दमे शूराः सत्यशूरास्तथापरे |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
यज्ञश्च दानं च धृतिः श्रुतं च; महाव्रता द्वादश व्राह्मणस्य ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
यज्ञश्च परमो धर्मस्तथाहिंसा च देहिषु |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
यज्ञश्चेत्प्रतिविद्धः स्यादङ्गेनैकेन यज्वनः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञसंस्कारविद्भिश्च क्रमशिक्षा विशारदैः |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञसेनः सपुत्रश्च शाल्वश्च वसुधाधिपः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञसेनश्च राजासौ व्रह्मण्य इति शुश्रुमः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
यज्ञसेनस्तु समरे कर्णपुत्रं महारथम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञसेनस्य कामस्तु पाण्डवाय़ किरीटिने |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२२८
धृतराष्ट्र उवाच
यज्ञसेनस्य दुहिता तेज एव तु केवलम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७५
व्राह्मणा ऊचुः
यज्ञसेनस्य दुहिता द्रुपदस्य महात्मनः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
यज्ञसेनेन दासीनां सहस्राणि चतुर्दश |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञस्य च न विघ्नः स्यात्प्रजानां च शिवं भवेत् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
यज्ञस्य परमा योनिः पतिश्चाय़ं परः स्मृतः ||
४९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञस्य विधिमग्र्यं वै फलं चैव नरर्षभ |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
यज्ञस्यार्थार्थमेवान्यत्तत्सर्वं यज्ञसाधनम् ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
यज्ञस्याय़तने तस्मिन्क्रिय़माणे वचोऽव्रवीत् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
यज्ञा देवांस्तर्पय़न्ति देवाः पृथिवीं भावय़न्ति ||
७ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
यज्ञा वेदाश्च चत्वारः सर्वमेतौ मम द्विज ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
यज्ञांश्च विविधाकारान्विधींश्च विविधांस्तथा ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
यज्ञाङ्गं कथिता गावो यज्ञ एव च वासव |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
यज्ञाङ्गं दक्षिणास्तात वेदानां परिवृंहणम् |
११ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
यज्ञाङ्गानि च चत्वारि तस्य संहननेऽभवन् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
यज्ञाङ्गानि च सर्वाणि वषट्कारश्च मूर्तिमान् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
यज्ञाङ्गान्यपि चैतानि यथोक्तानि नसंशय़ः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
यज्ञात्प्रजा प्रभवति नभसोऽम्भ इवामलम् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञाध्ययनदानानि त्रय़ः साधारणाः स्मृताः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
यज्ञानां चापि पञ्चानां यजनं धर्म उच्यते ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
यज्ञानां चैव यज्ञं त्वां तपश्च तपसामपि |
३ क