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अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
भीष्म उवाच
यथात्मानं यथा पुत्रांस्तथैतान्परिपालय़ेत् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १८४
वैशम्पाय़न उवाच
यथात्मीय़ान्यजिनानि सर्वे; संस्तीर्य वीराः सुषुपुर्धरण्याम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
यथात्र कश्चिन्मेधावी दृष्टात्मा पूर्वजन्मनि |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
वृहस्पतिरु उवाच
यथादित्यः पुनरुद्यंस्तमः सर्वं व्यपोहति |
३३ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
यथादित्यः समुद्यन्वै तमः सर्वं व्यपोहति |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
यथादित्यान्मणेश्चैव वीरुद्भ्यश्चैव पावकः |
१२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
यथादिपद्मं तरुणार्कवर्णं; रराज नाराय़णनाभिजातम् ||
८९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
यथादिष्टान्यनीकानि पाण्डवानामय़ोजय़त् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
यथादृश्यत घर्मांशुस्तथा द्रोणोऽप्यदृश्यत ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
यथादृष्टं मय़ा प्रोक्तं सनिर्याणमिदं जगत् |
४७ क
वन पर्व
अध्याय २८६
वैशम्पाय़न उवाच
यथादृष्टं यथातत्त्वं यथोक्तमुभय़ोर्निशि |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वासुदेव उवाच
यथादृष्टं हृषीकेशे सर्वमाख्यातुमर्हति ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय ४१
पितर ऊचुः
यथादृष्टमिदं चास्मै त्वय़ाख्येय़मशेषतः ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
यथादेशं महर्षेस्तु शुश्रूषापरमौ तदा |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
यथादेशं यथाकालमपि चैव यथावलम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
यथादेशं यथाप्रीति चिक्रीडुः कृष्णपार्थय़ोः ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
यथाद्य समरे कर्णं हनिष्यामि हतोऽथ वा |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
यथाद्रिं वारिधाराभिः समन्ताद्व्यकिरच्छरैः ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
यथाद्रिशृङ्गं सुमहत्प्रणुन्नं; वज्रेण देवाधिपचोदितेन ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३११
भीष्म उवाच
यथाध्वरे समिद्धोऽग्निर्भाति हव्यमुपात्तवान् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
यथाध्वानमपाथेय़ः प्रपन्नो मानवः क्वचित् |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
यथानलं प्रज्वलितं पतङ्गाः समभिद्रुताः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
यथानिदेशं राज्ञस्तौ सत्कृत्योपचचार ह ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
यथानिरुद्धस्य यथाभिमन्यो; र्यथा सुनीथस्य यथैव भानोः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
यथानिशेषु सर्वतःस्पृशत्सु सर्वदारिषु |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
यथानिसृष्टं तं देशमगच्छद्देवशासनात् ||
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
यथानुपूर्व्या विविशुर्नराग्र्या; स्तदा महार्हेषु न विस्मय़न्तः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
यथानुरूपं प्रतिपूज्य तं जनं; जगाम संशप्तकसङ्घहा पुनः ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
यथानृतं च सत्यं च यथा चापि विषामृते |
५२ क
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
यथानैषीः सभां कृष्णां तथा युध्यस्व पाण्डवम् ||
२१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
यथान्तकमनुप्राप्य जीवन्कश्चिन्न मुच्यते |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
यथान्तकालसमय़े सुघोराः स्युस्तथा नृप ||
६२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
यथान्तकाले क्षपय़न्दिधक्षु; र्भूतान्तकृत्काल इवात्तदण्डः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
यथान्धः स्वगृहे युक्तो ह्यभ्यासादेव गच्छति |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
यथान्धकारे खद्योतं लीय़मानं ततस्ततः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
यथान्धवधिरोन्मत्ता उच्छ्वासपरमाः सदा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
यथान्नं क्षुधितो लव्ध्वा न भुञ्जीत यदृच्छय़ा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
यथान्याय़ं कुरुश्रेष्ठ जानासि न च कत्थसे ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
यथान्याय़ं कौशलं वन्दनं च; समागता मद्वचनेन वाच्याः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
यथान्याय़ं त्वय़ा तात प्रश्नः पृष्टः सुसङ्कटः |
८० क
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
यथान्याय़ं महातेजा मानी धर्मभृतां वरः ||
३० ग
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
यथान्याय़ं महातेजाः शौचं परममास्थितः |
४ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
यथान्याय़मुपाक्रान्तस्तमृषिं संशितव्रतम् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
यथान्याय़ोपनीतार्थं कृतं हेतुमदर्थवत् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
यथापुरं यथाय़ोगं न च स्याच्छलनं पुनः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७१
भीष्म उवाच
यथापृच्छत्पद्मय़ोनिमेतदेव शतक्रतुः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
यथाप्रज्ञं तु ते प्रश्नान्प्रतिवक्ष्यामि पृच्छ माम् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
यथाप्रज्ञं महाप्राज्ञ भौमान्वक्ष्यामि ते गुणान् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
यथाप्रतिज्ञं कालं तं चरन्तु वनमाश्रिताः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
यथाप्रतिज्ञं कौरव्य स चापि समितिञ्जय़ः |
७ क