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शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
यदिष्टं तत्सुखं प्राहुर्द्वेष्यं दुःखमिहोच्यते |
२७ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
यदिय़ेष रथात्कर्णं हन्तुं तार्क्ष्य इवोरगम् ||
५७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
यदीच्छसि महावाहो शाश्वतीं गतिमुत्तमाम् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
यदीच्छसि महीं भोक्तुमिमां सागरमेखलाम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
यदीच्छसि श्रिय़ं तात यादृशीं तां युधिष्ठिरे |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
यदीच्छसि श्रिय़ं तात सुविशिष्टां युधिष्ठिरात् ||
६८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
यदीच्छसि सहामात्यो भोक्तुमर्धं महीक्षिताम् ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९
भीष्म उवाच
यदीच्छेच्छोभनां जातिं प्राप्तुं भरतसत्तम ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
यदीदं कत्थनात्सिध्येत्कर्म लोके धनञ्जय़ |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
यदीदृशं प्रभाषेथा भीमसेनासमं वचः ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
यदीप्सुरुपपन्नस्त्वं तस्य कालोऽय़मागतः |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
यदीमां धर्मपत्नीं त्वं मत्तः प्रार्थय़सेऽनघ |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
यदीमां भवतो वुद्धिं विद्याम वय़मीदृशीम् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
यदीमां रजनीं व्युष्टां न निहन्मि परान्रणे ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
यदीमानि हवींषीह विमथिष्यन्त्यसाधवः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
यदीमे सहसा क्रुद्धे समेय़ातां शिले इव |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
यदुं च तुर्वसुं चैव देवय़ानी व्यजाय़त |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
यदुं च तुर्वसुं चैव शक्रविष्णू इवापरौ ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
यदुं पूरुं तुर्वसुं च द्रुह्युं चानुं च भारत ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
यदुक्तं तेन वीरेण राज्ञा काञ्चनवर्मणा ||
१७ ख
मौसल पर्व
अध्याय ७
वसुदेव उवाच
यदुक्तं पार्थ कृष्णेन तत्सर्वमखिलं कुरु ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
यदुक्तं वचनं तेन विदुरेण महात्मना ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
यदुक्तं वचनं मेऽद्य त्वय़ा मद्रजनेश्वर |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
यदुक्तं वासुदेवेन श्रावय़ामास तद्वचः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
यदुक्तं वेदवादेषु गहनं वेददृष्टिभिः |
५८ क
आदि पर्व
अध्याय ७८
शर्मिष्ठो उवाच
यदुक्तमृषिरित्येव तत्सत्यं चारुहासिनि |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
यदुक्तवत्यसदृशं वैदेही पश्चिमं वचः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
यदुक्तवानसौ तन्मे गदतः शृणु भारत ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
यदुक्तवान्पितुर्मह्यं मार्कण्डेय़ो महानृषिः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
यदुक्तवान्महाप्राज्ञः क्षत्ता हितमनामय़म् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
यदुक्तश्च सभामध्ये पुरुषो ह्रस्वदर्शनः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
यदुक्तस्तत्करिष्यामि न हि मेऽत्र विचारणा ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
यदुक्ता सरितां श्रेष्ठा विश्वामित्रेण धीमता ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११
शल्य उवाच
यदुक्तासि मय़ा देवि सत्यं तद्भविता ध्रुवम् ||
२० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
यदुद्यम्य महत्कृत्यं भय़ादपि निवर्तते ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
यदुद्यम्य महावाहुः सात्यकिं न्यहनद्भुवि ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
यदुद्वपन्प्रवपंश्चैव वाणा; न्स्थातातताय़ी समरे किरीटी |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ८०
यय़ातिरु उवाच
यदुनाहमवज्ञातस्तथा तुर्वसुनापि च |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
भीष्म उवाच
यदुपगणितशाश्वताव्ययं त; च्छुभममृतत्वमशोकमृच्छतीति ||
१०८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
यदुपात्तं पुरा घोरं तस्य रूपमुदीर्यते ||
१०१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
यदुपाय़ात्तु साय़ाह्ने कृत्वा पार्थस्य किल्विषम् |
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
यदुपाय़ेन सर्वार्थान्नित्यं मृगय़सेऽनघ ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
यदुपेक्षन्त कुरवो भीष्ममुख्याः; कामानुगेनोपरुद्धां रुदन्तीम् ||
३१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
यदुपेक्षितवान्क्षुद्रो धिक्तमस्तु युधिष्ठिरम् ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
यदुप्रवीर योऽय़ं ते स्वस्रीय़स्यात्मजः प्रभो |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १२०
वैशम्पाय़न उवाच
यदुप्रवीराः स्वगृहाणि जग्मू; राजापि तीर्थान्यनुसञ्चचार ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
यदुभ्यश्च शिविर्लेभे शिवेश्चापि प्रतर्दनः ||
७८ ख
आदि पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
यदुर्ज्येष्ठस्तव सुतो जातस्तमनु तुर्वसुः |
१४ क