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वन पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र भोजनशिष्टस्य पर्वताः पञ्चविंशतिः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
यत्र भोज्यं वहुविधं भक्ष्यं पेय़ं च पाण्डव |
७० क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र मङ्कणकः सिद्धस्तपस्तेपे महामुनिः ||
६३ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
यत्र मङ्कणकः सिद्धो महर्षिर्लोकविश्रुतः ||
९७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
यत्र मन्दाञ्शत्रुवशं प्रय़ाता; नमोचय़द्भीमसेनो जय़श्च ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
यत्र मन्दारपुष्पार्थं नलिनीं तामधर्षय़त् ||
११२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
यत्र मन्येत भूय़िष्ठं प्रावृषीव तृणोलपम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र मां भगवान्राजा श्वशुरो वाक्यमव्रवीत् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १४०
लोमश उवाच
यत्र माणिचरो यक्षः कुवेरश्चापि यक्षराट् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र माद्रवतीपुत्रौ रतिस्तत्र परा मम ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र माषादमृषभमाससाद वृहद्रथः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५
द्रौणिरु उवाच
यत्र मित्रममित्रं वा परीक्षन्ते वुधा जनाः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
भीष्म उवाच
यत्र मुञ्जवटे रामो जटाहरणमादिशत् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
धृतराष्ट्र उवाच
यत्र मे तनय़ाः सर्वे जीय़न्ते न जय़न्त्युत |
३ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
यत्र मे नीय़ते भर्ता स्वय़ं वा यत्र गच्छति |
२० क
वन पर्व
अध्याय ५७
वृहदश्व उवाच
यत्र मे वचनं राजा नाभिनन्दति मोहितः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र मे हृदय़ं दुःखाच्छतधा न विदीर्यते ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र यः स्वपते विप्रः क्षत्रिय़ो वापि भारत |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र यज्ञे यय़ातेस्तु महाराज सरस्वती |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
यत्र यत्र च वक्तव्यं तद्वक्ष्यामि जनार्दन |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
यत्र यत्र च सन्देहो भूय़स्ते राजसत्तम |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
यत्र यत्र तु पाण्डूनां द्रोणो द्रावय़ते चमूम् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र यत्र तु वार्ष्णेय़ो वर्तते पथि भारत |
११ क
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
यत्र यत्र तु वैदेही पश्यत्याश्रममण्डलम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
यत्र यत्र रथो याति पाण्डवस्य महात्मनः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
यत्र यत्र सुतं तुभ्यं यो यः पश्यति भारत |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
यत्र यत्र स्म दृश्यन्ते प्रदीपाः कुरुसत्तम |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
यत्र यत्र हि गच्छामि कर्णाद्भीतो धनञ्जय़ |
२० क
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र यत्र हि दृश्यन्ते प्राणिनः खाण्डवालय़ाः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र यत्र हि यो विप्रो यान्यान्कामानभीप्सति |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
द्युमत्सेन उवाच
यत्र यत्रैव शक्येरन्संय़न्तुं समय़े प्रजाः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१९
नमुचिरु उवाच
यत्र यत्रैव संय़ुङ्क्ते धाता गर्भं पुनः पुनः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
यत्र यातान्न वो हन्युः पाण्डवाः किं सृतेन वः ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
यत्र यात्येष तत्र त्वं चोदय़ाश्वाञ्जनार्दन |
३० क
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
यत्र यान्त्यृषय़ो व्रह्मन्पूताः स्वैः कर्मभिः शुभैः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
यत्र युद्धमभूद्घोरं दशाहान्यतिदारुणम् |
१५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
दुर्योधन उवाच
यत्र युध्यामहे सर्वे धनलोभात्समागताः ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र यूपा मणिमय़ाश्चित्याश्चापि हिरण्मय़ाः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः |
७८ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
यत्र योगेश्वरः स्थाणुः स्वय़मेव वृषध्वजः |
१४२ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
यत्र यौधिष्ठिरं सैन्यं विषादमगमत्परम् ||
१५५ ख
आदि पर्व
अध्याय ४६
काश्यप उवाच
यत्र राजा कुरुश्रेष्ठः परिक्षिन्नाम वै द्विज |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
यत्र राजा च राज्ञश्च पुरुषाः प्रत्यनन्तराः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
यत्र राजा धर्मनित्यो राज्यं वै पर्युपासिता |
५५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
यत्र राजा पाण्डवः सत्यसन्धो; व्यवस्थितो भीमसेनार्जुनौ च |
५१ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र राजा महातेजा धर्मपुत्रः स्थितोऽभवत् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
यत्र राजा महाप्राज्ञः सर्वधर्मभृतां वरः |
१९३ क
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
यत्र राजा सत्यसन्धो धर्मराजो युधिष्ठिरः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
यत्र राजा हतान्पुत्रान्पौत्रानन्यांश्च पार्थिवान् |
२१४ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
यत्र राज्ञा उलूकस्य प्रेषणं पाण्डवान्प्रति |
१५० क